{"_id":"5ab906a94f1c1b21578b6ac8","slug":"161522075305-agra-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"वैष्णो देवी की जात को लुढ़कते-लुढ़कते जा रहे लोटन बाबा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
वैष्णो देवी की जात को लुढ़कते-लुढ़कते जा रहे लोटन बाबा
Updated Mon, 26 Mar 2018 08:28 PM IST
विज्ञापन
लुढ़कते हुए जा रहे हैं लोटन बाबा।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फरह (मथुरा)। वैष्णो देवी की जात को लुढ़कते हुए जा रहे हैं लोटन बाबा। बाबा को देख हर कोई दांतों तले अंगुली दबा रहा है। बाबा तेजी से हाईवे पर पैरों का प्रयोग किए बिना लुढ़कते हुए वैैष्णो देवी के दर्शनों को जा रहे हैं। उसके साथ तीन सहयोगी संत भी हैं। यात्रा छह माह में कटरा (जम्मू) पहुंचेगी।
पिपरिया होशंगाबाद महाराष्ट्र के दुर्गा मंदिर से बाबा लोटन दास ने अगस्त 2017 में लुढ़कते हुए यात्रा शुरू की है। सात माह बाद यात्रा का पड़ाव फरह के निकट रहा। ऐसा नहीं है कि बाबा अकेले हों, वरन उनके साथ पूरा तामझाम बंधा है। एक रथनुमा गाड़ी उनके आगे चलती है। एक काला कुत्ता भी बाबा के साथ है। दो अन्य सहयोगी संत उनके साथ पैदल यात्रा पूरी कर रहे हैं।
देवी भक्त लोटन ने बताया कि यात्रा का उद्देश्य जनकल्याण है। लुढ़कते-लुढ़कते बाबा के पैर लहूलुहान हो गए हैं। लेकिन बाबा को इस बात की तनिक चिंता नहीं है। साथ चल रहे गूंगा महाराज व नर्मदा देव बताते हैं कि डामर की रोड पर लुढ़कते-लुढ़कते बाबा के कपड़े दो दिन चल पाते हैं। तीसरे दिन नए और मोटे कपड़े पहनाने होते हैं। वह बताते हैं कि वे एक दिन में छह सात किमी की यात्रा करते हैं। इसके बाद वहीं रात्रि ठहराव करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
पिपरिया होशंगाबाद महाराष्ट्र के दुर्गा मंदिर से बाबा लोटन दास ने अगस्त 2017 में लुढ़कते हुए यात्रा शुरू की है। सात माह बाद यात्रा का पड़ाव फरह के निकट रहा। ऐसा नहीं है कि बाबा अकेले हों, वरन उनके साथ पूरा तामझाम बंधा है। एक रथनुमा गाड़ी उनके आगे चलती है। एक काला कुत्ता भी बाबा के साथ है। दो अन्य सहयोगी संत उनके साथ पैदल यात्रा पूरी कर रहे हैं।
विज्ञापन
देवी भक्त लोटन ने बताया कि यात्रा का उद्देश्य जनकल्याण है। लुढ़कते-लुढ़कते बाबा के पैर लहूलुहान हो गए हैं। लेकिन बाबा को इस बात की तनिक चिंता नहीं है। साथ चल रहे गूंगा महाराज व नर्मदा देव बताते हैं कि डामर की रोड पर लुढ़कते-लुढ़कते बाबा के कपड़े दो दिन चल पाते हैं। तीसरे दिन नए और मोटे कपड़े पहनाने होते हैं। वह बताते हैं कि वे एक दिन में छह सात किमी की यात्रा करते हैं। इसके बाद वहीं रात्रि ठहराव करते हैं।
विज्ञापन