नवारो का दावा गलत: भारत में मुफ्त AI कोई चैरिटी नहीं, बल्कि फ्री डेटा हड़पना चाहती हैं अमेरिकी कंपनियां

नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीनीतीश कुमार
Thu, 22 Jan 2026 06:04 PM IST
सार

Peter Navarro On AI To India:

वाइट हाउस के सलाहकार पीटर नवारो ने हाल ही में दावा कि अमेरिकी कंपनियां भारत को मुफ्त एआई देकर दान कर रही हैं। हालांकि, हकीकत इसके उलट है। एआई को ट्रेन करने के लिए इन कंपनियों को जहां करोड़ों डॉलर खर्च करने पड़ते, वहीं भारत जैसे देशों में सेवाएं देकर ये कंपनियां करोड़ों डॉलर का खर्च बचा रही हैं। आइए जानते हैं पीटर नवारो का भारत को मुफ्त एआई देने का दावा कैसे गलत है।

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पीटर नवारो (वाइट हाउस सलाहकार) - फोटो : एक्स/वीडियो ग्रैब

    विस्तार

    हाल ही में वाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने एक पॉडकास्ट के दौरान भारत में अमेरिकी एआई (AI) सेवाओं के विस्तार पर तीखा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स भारत में एआई के विस्तार का खर्च उठा रहे हैं। नवारो ने तर्क देते हुए कहा था कि चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसे टूल्स अमेरिकी जमीन और बिजली का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि भारत जैसे देशों को ये सेवाएं बहुत सस्ती या मुफ्त दी जा रही हैं। उन्होंने इसे अमेरिकी कंपनियों द्वारा किया जाने वाला एक तरह का परोपकार या चैरिटी बताया। लेकिन तकनीकी जानकारों का मानना है कि नवारो यहां पूरी तरह गलत हैं।

    परोपकार नहीं, डेटा की भूख मिटा रही अमेरिकी एआई कंपनियां

    दुनिया की कोई भी बड़ी टेक कंपनी, चाहे वह गूगल हो या ओपनएआई, मुफ्त में कुछ भी नहीं देती। भारत में एआई टूल्स को कम कीमत या एयरटेल-जियो के रिचार्ज के साथ मुफ्त देने के पीछे एक बहुत बड़ा व्यापारिक स्वार्थ है। एआई के विकास के शुरुआती दौर में इन कंपनियों को अपने मॉडल्स को और बेहतर बनाने के लिए भारी मात्रा में यूनिवर्सल डेटा की जरूरत है। इंटरनेट पर मौजूद सार्वजनिक डेटा अब लगभग खत्म हो चुका है, इसलिए अब उन्हें यूजर डेटा (इंसानों द्वारा किया जाने वाला वास्तविक संवाद) चाहिए। भारत, अपनी विशाल आबादी के कारण, इस डेटा का सबसे बड़ा खजाना है।

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    भारत डेटा के लिहाज से बड़ा बाजार है
    भारत डेटा के लिहाज से बड़ा बाजार है - फोटो : Adobe

    चीन के साथ एआई की जंग में भारत एक हथियार

    दूसरा बड़ा कारण है वैश्विक बाजार में चीन को मात देना। फिलहाल एआई के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों को चीन के डीपसीक (DeepSeek) जैसे मॉडल्स से कड़ी चुनौती मिल रही है। चीनी एआई मॉडल्स न केवल सस्ते हैं, बल्कि ओपन सोर्स होने के कारण कंपनियों को ज्यादा लचीलापन भी देते हैं। अमेरिकी कंपनियां चाहती हैं कि इससे पहले कि चीनी एआई भारत के बाजार पर कब्जा करें, वे खुद को पहले स्थापित कर लें। भारत जैसे बड़े बाजार में अपना एकाधिकार बनाए रखना उनके भविष्य के मुनाफे के लिए बहुत जरूरी है।

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    अहसान भारत पर नहीं, भारत की ओर से है

    इस पूरे संदर्भ में नवारो का बयान न सिर्फ विवादित बल्कि तथ्यात्मक रूप से गलत साबित होता है। टेक कंपनियों की ताकत यूजर्स और उनके डेटा से आती है। इस लिहाज से देखा जाए तो भारत को अमेरिकी एआई कंपनियों से कोई बड़ा फायदा नहीं, बल्कि डेटा बाहर जाने से देश का नुकसान ही हो रहा है।

    तकनीक में भारत की आत्मनिर्भरता जरूरी
    तकनीक में भारत की आत्मनिर्भरता जरूरी - फोटो : AI

    हकीकत तो यह है कि भारतीय यूजर्स इन एआई मॉडल्स को इस्तेमाल करके वास्तव में उन्हें मुफ्त में ट्रेन कर रहे हैं। जिस काम के लिए कंपनियों को डेटा वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को करोड़ों रुपये देने पड़ते, वही काम भारतीय यूजर्स मुफ्त में कर रहे हैं। ऐसे में यह कहना कि अमेरिकी कंपनियां भारत पर अहसान कर रही हैं, सच्चाई से कोसों दूर है।

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    भारत को तकनीक में बनना होगा आत्मनिर्भर

    एक्सपर्ट्स कई बार चेतावनी दे चुके हैं कि लंबे समय में भारत के लिए यही बेहतर होगा कि वह विदेशी तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय अपना 'स्वदेशी एआई' विकसित करे, ताकि देश का कीमती डेटा देश के भीतर ही रहे। साफ है कि न अमेरिकी कंपनियां भारत में दोस्ती निभा रही हैं, न भारत इन टूल्स का इस्तेमाल किसी एहसान के तहत कर रहा है। दोनों तरफ फैसले जरूरत और रणनीति से तय हो रहे हैं।

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