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Dattatreya Jayanti 2023: दत्तात्रेय जयंती आज, जानिए भगवान दत्तात्रेय के जन्म की पौराणिक कथा एवं इनका स्वरूप
Tue, 26 Dec 2023 12:40 PM IST
आशिकी पटेल
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: आशिकी पटेल
Updated Tue, 26 Dec 2023 12:40 PM IST
सार
Dattatreya Jayanti 2023: मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा को दत्तात्रेय जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ था। अनेक शास्त्रों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव तीनों का सम्मलित स्वरूप माना जाता है।
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Dattatreya Jayanti 2023
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Dattatreya Jayanti 2023: मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा को दत्तात्रेय जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ था। अनेक शास्त्रों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव तीनों का सम्मलित स्वरूप माना जाता है। इस दिन त्रिगुण स्वरूप दत्तात्रेय की पूजा का विधान है।इस दिन भगवान दत्तात्रेय के निमित्त व्रत करने व दर्शन-पूजन करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान दत्त के नाम पर दत्त संप्रदाय का उदय हुआ। दक्षिण भारत सहित पूरे देश में इनके अनेक प्रसिद्ध मंदिर भी हैं।
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ऐसे हुआ दत्तात्रेय का अवतार
शास्त्रों के अनुसार महर्षि अत्रि मुनि की पत्नी अनुसूया के पतिव्रत धर्म की चर्चा तीनों लोक में होने लगी। जब नारदजी ने अनुसूया के पतिधर्म की सराहना तीनों देवियों से की तो माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती ने अनुसूया की परीक्षा लेने की ठान ली। सती अनसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने के लिए त्रिदेवियों के अनुरोध पर तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु और शिव पृथ्वी लोक पहुंचे। अत्रि मुनि की अनुपस्थिति में तीनों देव साधु के भेष में अनुसूया के आश्रम में पहुंचे और माता अनसूया के सम्मुख भोजन करने की इच्छा प्रकट की।
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देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना धर्म मानते हुए उनकी बात मान ली और उनके लिए प्रेम भाव से भोजन की थाली परोस लाई। परन्तु तीनों देवताओं ने माता के सामने यह शर्त रखी कि वह उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन कराए। इस पर माता को संशय हुआ।इस संकट से निकलने के लिए उन्होंने ध्यान लगाकर जब अपने पति अत्रि मुनि का स्मरण किया तो सामने खड़े साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े दिखाई दिए। माता अनसूया ने अत्रिमुनि के कमंडल से जल निकलकर तीनों साधुओं पर छिड़का तो वे छह माह के शिशु बन गए। तब माता ने शर्त के मुताबिक उन्हें भोजन कराया।
वहीं बहुत दिन तक पति के वियोग में तीनों देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद मुनि ने उन्हें पृथ्वी लोक का वृत्तांत सुनाया। तीनों देवियां पृथ्वी लोक पहुंचीं और माता अनसूया से क्षमा याचना की। तीनों देवों ने भी अपनी गलती को स्वीकार कर माता की कोख से जन्म लेने का आग्रह किया। इसके बाद तीनों देवों ने दत्तात्रेय के रूप में जन्म लिया।तीनों देवों को एकसाथ बालरूप में दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के चरणों का जल तीनों देवो पर छिड़का और उन्हें पूर्ववत रुप प्रदान कर दिया।
भगवान दत्तात्रेय का स्वरूप
श्री मदभागवत ग्रंथ में उल्लेख है कि महर्षि अत्रि ने जगत के पालनहार श्री विष्णु को पुत्र रूप में पाने की अभिलाषा की थी। उनकी इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए एक दिन भगवान ने प्रकट होकर महर्षि से कहा- 'मैंने स्वयं को आपको दिया।' इसी देने के भाव से 'दत्त' और अत्रि के ज्येष्ठ पुत्र होने से आत्रेय का मिला हुआ रूप दत्तात्रेय हुआ एवं इनकी माता परम पतिभक्त सती अनुसूया थीं। इनका स्वरूप बहुत निराला है, इनके तीन सिर हैं और छ: भुजाएँ हैं। इनके भीतर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों का ही संयुक्त रुप से अंश मौजूद है।