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हिमाचल: ऊहल नदी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की चपेट में, हिमालय के दूरदराज इलाके में भी मिले प्लास्टिक कण

Mon, 28 Sep 2026 09:50 AM IST
Ankesh Dogra अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Mon, 28 Sep 2026 09:50 AM IST
सार

हिमाचल प्रदेश की धौलाधार पर्वतमाला में थमसर ग्लेशियर से निकलने वाली ऊहल नदी में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की मौजूदगी सामने आई है। अध्ययन में कुकर गुंधा, जीरो प्वाइंट और बरोट से पानी व तलछट के नमूने लिए गए। शोधकर्ताओं को पानी और तलछट दोनों में माइक्रोप्लास्टिक मिला। जांच में पॉलीस्टाइरीन, पॉलीएथिलीन, पॉलीप्रोपाइलीन, पीवीसी और पीईटी जैसे प्लास्टिक पॉलिमर के संकेत मिले हैं।

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uhal river himachal microplastic pollution thamsar glacier study 2026
ऊहल नदी। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश की धौलाधार पर्वतमाला में थमसर ग्लेशियर से निकलने वाली ऊहल नदी में भी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की मौजूदगी सामने आई है। अध्ययनकर्ताओं ने ऊहल नदी के तीन स्थानों कुकर गुंधा, जीरो प्वाइंट और बरोट से पानी और तलछट के नमूने लिए। अध्ययन में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा के साथ उनके आकार, रंग और रासायनिक संरचना की भी जांच की गई। पानी और तलछट दोनों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी मिली। कुकर गुंधा नदी का ऐसा क्षेत्र है, जहां मानवीय हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम है और यह निकटतम गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर है।

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यहां पानी में औसतन 55 से 65 माइक्रोप्लास्टिक कण प्रति लीटर और तलछट में 89 से 103 कण प्रति किलोग्राम मिले। शोधकर्ताओं ने इसे इस बात का संकेत माना है कि माइक्रोप्लास्टिक अपेक्षाकृत दूरस्थ हिमालयी क्षेत्रों तक भी पहुंच रहा है। जीरो प्वाइंट पर जहां नदी के किनारे कृषि क्षेत्र हैं और कई छोटी सहायक धाराएं मिलती हैं, पानी में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा 84 से 116 कण प्रति लीटर और तलछट में 143 से 179 कण प्रति किलोग्राम मिली। अध्ययन में कृषि गतिविधियों, घरेलू गतिविधियों और प्लास्टिक कचरे को संभावित स्रोतों में शामिल किया गया है। 

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सीयू कांगड़ा के अभिषेक कुमार और रेशमा सिन्हा, एमिटी विवि हरियाणा के असीम ग्रोवर और लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी पंजाब की दिव्या ज्योति ने यह अध्ययन किया है। शोधपत्र 23 सितंबर 2026 को डिस्कवर एनवायरनमेंट में प्रकाशित हुआ है।

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पॉलीथीन समेत कई प्लास्टिक की भी पुष्टि
कणों की रासायनिक संरचना जानने के लिए एफटी-आईआर (फूरियर ट्रांसफॉर्म इन्फ्रारेड) स्पेक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल किया गया। जांच में पॉलीस्टाइरीन, पॉलीएथिलीन, पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलीविनाइल क्लोराइड और पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट जैसे पॉलिमर की मौजूदगी के संकेत मिले। अध्ययन में बारोट को बांध वाला क्षेत्र बताया गया है। शोधकर्ताओं ने उल्लेख किया है कि बांध प्लास्टिक कचरे को रोकने, पुनर्वितरित करने और जल प्रवाह में बदलाव के जरिये माइक्रोप्लास्टिक के वितरण को प्रभावित कर सकते हैं। अध्ययन ने ऊहल नदी में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के लिए आधारभूत आंकड़े उपलब्ध कराए हैं।

टूटे हुए प्लास्टिक के टुकड़े सबसे अधिक
नमूनों में मिले माइक्रोप्लास्टिक में 83.16 प्रतिशत टुकड़े थे। रेशे और पतली फिल्म दोनों की हिस्सेदारी 8.42-8.42 प्रतिशत रही। तलछट में टुकड़ों की हिस्सेदारी और अधिक, 87.61 प्रतिशत रही। रेशे 6.41 और फिल्म 5.97 प्रतिशत मिले। रंग के आधार पर पानी में रंगहीन कण 41.08 प्रतिशत और नीले कण 39.73 प्रतिशत थे। तलछट में रंगहीन कण 42.26 और नीले कण 38.72 प्रतिशत पाए गए। शोधकर्ताओं के अनुसार, कणों का आकार भी अलग-अलग था और उनकी पहचान सूक्ष्मदर्शी जांच से की गई।
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