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Shimla News: बैंक में 14 लाख के गबन के आरोपी दो कर्मचारी बरी
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सहकारी बैंक में वर्ष 2017 में हुई थी धोखाधड़ी
साक्ष्यों के अभाव में आरोपियों को किया दोषमुक्त
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शिमला प्रथम श्रेणी मनु प्रिंजा की अदालत ने हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी बैंक में वर्ष 2017 में हुई 14 लाख रुपये की धोखाधड़ी मामले में दोनों आरोपियों को बरी कर दिया है।
पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में दोनों आरोपी किन्नौर निवासी विजय कुमार नेगी और कांगड़ा निवासी संचित आचार्य को बरी किया है। मामला वर्ष 2011 का है जब बैंक की मुख्य शाखा की वरिष्ठ प्रबंधक सुमित्रा कंवर ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। आरोप था कि बैंक के ड्राफ्ट पेयेबल अकाउंट से लगभग 14 लाख रुपये की राशि को कमल चंद नामक व्यक्ति के एक निष्क्रिय बचत खाते में फर्जी तरीके से स्थानांतरित किया था। अदालती कार्रवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि बैंक के नियमित कर्मचारियों को बचाने के लिए इन दो संविदा कर्मियों को बलि का बकरा बनाया था। अदालत ने पाया कि जांच एजेंसी ने इस मामले की गहनता से जांच नहीं की है। बैंक के अन्य अधिकारियों की संलिप्तता की ओर इशारा करने वाली आंतरिक जांच रिपोर्ट के बावजूद केवल दो संविदा कर्मियों को ही निशाना बनाया गया है। अदालत ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि बैंक का निष्क्रिय खाता किसके कहने पर और किस प्रक्रिया के तहत सक्रिय किया गया था।
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साक्ष्यों के अभाव में आरोपियों को किया दोषमुक्त
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शिमला प्रथम श्रेणी मनु प्रिंजा की अदालत ने हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी बैंक में वर्ष 2017 में हुई 14 लाख रुपये की धोखाधड़ी मामले में दोनों आरोपियों को बरी कर दिया है।
पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में दोनों आरोपी किन्नौर निवासी विजय कुमार नेगी और कांगड़ा निवासी संचित आचार्य को बरी किया है। मामला वर्ष 2011 का है जब बैंक की मुख्य शाखा की वरिष्ठ प्रबंधक सुमित्रा कंवर ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। आरोप था कि बैंक के ड्राफ्ट पेयेबल अकाउंट से लगभग 14 लाख रुपये की राशि को कमल चंद नामक व्यक्ति के एक निष्क्रिय बचत खाते में फर्जी तरीके से स्थानांतरित किया था। अदालती कार्रवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि बैंक के नियमित कर्मचारियों को बचाने के लिए इन दो संविदा कर्मियों को बलि का बकरा बनाया था। अदालत ने पाया कि जांच एजेंसी ने इस मामले की गहनता से जांच नहीं की है। बैंक के अन्य अधिकारियों की संलिप्तता की ओर इशारा करने वाली आंतरिक जांच रिपोर्ट के बावजूद केवल दो संविदा कर्मियों को ही निशाना बनाया गया है। अदालत ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि बैंक का निष्क्रिय खाता किसके कहने पर और किस प्रक्रिया के तहत सक्रिय किया गया था।
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