यहां एक मूर्ति को पूजते हैं दो धर्मों के लोग
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लाहौल के त्रिलोकीनाथ मंदिर की महत्ता देखिए, यहां दो धर्मों के लोग एक ही मूर्ति की बड़े सद्भाव से पूजा करते हैं। साथ ही इस मंदिर के मुख्य द्वार पर बने दो खंभे पाप-पुण्य के तराजू हैं।
माना जाता है कि यह देश का ऐसा इकलौता मंदिर है जहां पर हिंदू और बौद्ध समुदाय के लोग एक साथ अपनी-अपनी पूजा पद्धति से पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
इस मंदिर की खासियत यह है कि इसमें स्थापित की गई मूर्ति को हिंदू जहां शिव के रूप में पूजते हैं, वहीं बौद्ध धर्म के लोग इसे अवलोकतेश्वर के रूप में मानते हैं। दोनों धर्मों के लोगों की पूजा लामा की ओर से ही करवाया जाता है।
हिंदू शिव तो बौद्ध पूजते हैं अवलोकतेश्वर को
त्रिलोकीनाथ मंदिर में एक ही छत के नीचे शिव और बुद्ध के लिए दीये जलते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर बने दो खंभों को पाप-पुण्य का तराजू माना जाता है। मान्यता है कि खंभों के बीच से भीमकाय शरीर वाला वही शख्स गुजर पाता है जो पाप से मुक्त हो। जबकि अधर्मी भले ही दुबले शरीर वाला क्यों न हो, खंभों के बीच फंस जाता है।
दिलचस्प है कि पाप और पुण्य की इस परीक्षा से बौद्ध और हिंदु दोनों समुदाय के लोग गुजरते हैं। जम्मू के कठुआ और गुजरात के पोरबंदर से यहां पहुंचे श्रद्धालु राम दयाल और हीरा बेन कहते हैं कि इस संदर्भ में उन्होंने इंटरनेट के जरिये जानकारी मिली।
लिहाजा, हिमालय की गोद में स्थापित इस दिलचस्प और प्राचीन धार्मिक स्थल को देखने के लिए वे यहां पहुंचे हैं। बेन ने बताया कि मंदिर के मुख्य द्वार के खंभों से प्रवेश कर उन्हें निश्चित तौर पर आत्मिक शांति की अनुभूति हुई है।
दोनों देवताओं के लिए जलते हैं दीये
मंदिर में एक बौद्ध लामा कई सालों से बतौर पुजारी तैनात हैं। मंदिर के गुर चूडू राम कहते हैं कि पाप-पुण्य की इस परंपरा का सदियों से निर्वहन होता आ रहा है।
चूडू राम की मानें तो खंभों के बीच फंसने वाला भविष्य में सद्मार्ग पर चलने का प्रण करके मंदिर से रुखसत होता है। उनके मुताबिक मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने वनवास के दौरान किया है।
उधर, वयोवृद्ध इतिहासकार छेरिंग दोरजे कहते हैं कि मंदिर का इतिहास अपने आप में कई रहस्यों को छुपाए हैं, जिसमें से अभी तक पर्दा उठना बाकी है।