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Shimla News: भूमि कटाव रोकने के लिए जल निकासी पर काम करने की जरूरत
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हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान पंथाघाटी में आयोजित कार्यक्रम में पर्यावरण विशेषज्ञों ने की वकालत
ढलानों का स्थरीकरण करना भी जरूरी होगा
सड़क कटिंग और तेज बारिश से बढ़ रहा खतरा
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमालयी क्षेत्रों में क्षरित भूमि और कटाव के पुनर्स्थापन के लिए पौधरोपण के साथ ढलान स्थिरीकरण और जल निकासी व्यवस्था पर काम करने की जरूरत है। यह बात हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान पंथाघाटी में शुक्रवार को आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कही। इसमें भूमि क्षरण (उत्पादकता कम होना) के कारणों और रोकथाम के उपायों पर चर्चा की।
संस्थान की निदेशक डॉ. मनीषा थपलियाल ने कहा कि तेज बारिश, सतही बहाव, सड़क निर्माण के दौरान ढलानों की कटिंग, जंगलों की आग, अत्यधिक चराई और अनियंत्रित विकास से भूमि क्षरण बढ़ रहा है। ऐसे क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण के साथ ड्रेनेज लाइन उपचार और ढलान स्थिरीकरण जरूरी है। उन्होंने कहा कि भूमि के पुनर्स्थापन के लिए स्थानीय और देशज प्रजातियों का चयन, प्राकृतिक पुनर्जनन, वर्षाजल संचयन और चराई प्रबंधन को बढ़ावा देना होगा। कुछ क्षेत्रों में आक्रामक प्रजातियां स्थानीय वनस्पतियों के पुनर्जनन में बाधा बन रही हैं। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रजातियों का चयन जरूरी है।
प्रशिक्षण में केंद्र सतत भूमि प्रबंधन देहरादून के वैज्ञानिक-एफ एवं प्रमुख डॉ. संजीव कुमार, कृषि विज्ञान केंद्र कुपवाड़ा के प्रभाग प्रमुख प्रो. जीएम भट्ट और डॉ. तनय वर्मन विषय विशेषज्ञ के रूप में शामिल रहे। वन, कृषि, उद्यान, पशुपालन, लोक निर्माण और जल निगम के अधिकारी, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि, पर्यावरण कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठनों के सदस्यों समेत 21 प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण लिया।
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ढलानों का स्थरीकरण करना भी जरूरी होगा
सड़क कटिंग और तेज बारिश से बढ़ रहा खतरा
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमालयी क्षेत्रों में क्षरित भूमि और कटाव के पुनर्स्थापन के लिए पौधरोपण के साथ ढलान स्थिरीकरण और जल निकासी व्यवस्था पर काम करने की जरूरत है। यह बात हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान पंथाघाटी में शुक्रवार को आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कही। इसमें भूमि क्षरण (उत्पादकता कम होना) के कारणों और रोकथाम के उपायों पर चर्चा की।
संस्थान की निदेशक डॉ. मनीषा थपलियाल ने कहा कि तेज बारिश, सतही बहाव, सड़क निर्माण के दौरान ढलानों की कटिंग, जंगलों की आग, अत्यधिक चराई और अनियंत्रित विकास से भूमि क्षरण बढ़ रहा है। ऐसे क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण के साथ ड्रेनेज लाइन उपचार और ढलान स्थिरीकरण जरूरी है। उन्होंने कहा कि भूमि के पुनर्स्थापन के लिए स्थानीय और देशज प्रजातियों का चयन, प्राकृतिक पुनर्जनन, वर्षाजल संचयन और चराई प्रबंधन को बढ़ावा देना होगा। कुछ क्षेत्रों में आक्रामक प्रजातियां स्थानीय वनस्पतियों के पुनर्जनन में बाधा बन रही हैं। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रजातियों का चयन जरूरी है।
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प्रशिक्षण में केंद्र सतत भूमि प्रबंधन देहरादून के वैज्ञानिक-एफ एवं प्रमुख डॉ. संजीव कुमार, कृषि विज्ञान केंद्र कुपवाड़ा के प्रभाग प्रमुख प्रो. जीएम भट्ट और डॉ. तनय वर्मन विषय विशेषज्ञ के रूप में शामिल रहे। वन, कृषि, उद्यान, पशुपालन, लोक निर्माण और जल निगम के अधिकारी, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि, पर्यावरण कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठनों के सदस्यों समेत 21 प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण लिया।
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