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Shimla News: गुरु अस्त का प्रभाव 9 को होगा खत्म, शुरू होंगे मांगलिक कार्य
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सूर्य के निकट आने से अस्त हुए थे देवगुरु
शुभ कार्य 25 दिन बाद दोबारा होंगे शुरू
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। देवगुरु बृहस्पति के अस्त रहने की अवधि 9 अगस्त को समाप्त हो जाएगी। वैदिक ज्योतिष के अनुसार इसके बाद विवाह, मुंडन, जनेऊ समेत कई मांगलिक और शुभ कार्य 25 दिन बाद दोबारा शुरू हो जाएंगे।
सूर्य के अत्यधिक निकट आने से बृहस्पति देवगुरु 15 जुलाई से 9 अगस्त तक अस्त रहेंगे हैं। संयोग से इस अवधि में चतुर्मास का भी आरंभ हो गया था जिसके कारण धार्मिक दृष्टि से भी शुभ कार्यों को टालने की परंपरा मानी जाती है। राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी उमेश नौटियाल ने बताया कि वैदिक ज्योतिष में गुरु को ज्ञान, धर्म, शिक्षा, संतान, समृद्धि और शुभता का कारक ग्रह माना है। मान्यता है कि गुरु के अस्त रहने की अवधि में उसके शुभ प्रभाव में कमी आती है जिससे कुछ लोगों को कार्यों में विलंब, निर्णय लेने में कठिनाई या अन्य प्रकार की रुकावटों का अनुभव होता है। हालांकि किसी भी व्यक्ति पर इसका प्रभाव उसकी जन्मकुंडली, ग्रह दशा और अन्य ज्योतिषीय योगों पर निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि गुरु अस्त की अवधि आध्यात्मिक साधना, आत्मचिंतन और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष रूप से अनुकूल मानी जाती है जबकि मांगलिक कार्यों को इस अवधि के बाद करना अधिक शुभ माना जाता है। शुभ कार्य होने से बाजारों में भी खरीदारी बढ़ने की उम्मीद है।
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शुभ कार्य 25 दिन बाद दोबारा होंगे शुरू
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। देवगुरु बृहस्पति के अस्त रहने की अवधि 9 अगस्त को समाप्त हो जाएगी। वैदिक ज्योतिष के अनुसार इसके बाद विवाह, मुंडन, जनेऊ समेत कई मांगलिक और शुभ कार्य 25 दिन बाद दोबारा शुरू हो जाएंगे।
सूर्य के अत्यधिक निकट आने से बृहस्पति देवगुरु 15 जुलाई से 9 अगस्त तक अस्त रहेंगे हैं। संयोग से इस अवधि में चतुर्मास का भी आरंभ हो गया था जिसके कारण धार्मिक दृष्टि से भी शुभ कार्यों को टालने की परंपरा मानी जाती है। राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी उमेश नौटियाल ने बताया कि वैदिक ज्योतिष में गुरु को ज्ञान, धर्म, शिक्षा, संतान, समृद्धि और शुभता का कारक ग्रह माना है। मान्यता है कि गुरु के अस्त रहने की अवधि में उसके शुभ प्रभाव में कमी आती है जिससे कुछ लोगों को कार्यों में विलंब, निर्णय लेने में कठिनाई या अन्य प्रकार की रुकावटों का अनुभव होता है। हालांकि किसी भी व्यक्ति पर इसका प्रभाव उसकी जन्मकुंडली, ग्रह दशा और अन्य ज्योतिषीय योगों पर निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि गुरु अस्त की अवधि आध्यात्मिक साधना, आत्मचिंतन और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष रूप से अनुकूल मानी जाती है जबकि मांगलिक कार्यों को इस अवधि के बाद करना अधिक शुभ माना जाता है। शुभ कार्य होने से बाजारों में भी खरीदारी बढ़ने की उम्मीद है।
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