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Shimla News: क्लेम रद्द करना गलत, कंपनी को 4.35 लाख देने का आदेश

Sat, 03 Oct 2026 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sat, 03 Oct 2026 11:59 PM IST
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The cancellation of the claim was wrong and the company was ordered to pay Rs 4.35 lakh.
राज्य उपभोक्ता आयोग शिमला ने सुनाया फैसला
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जिला आयोग ने निरस्त कर दी थी उपभोक्ता की याचिका
रुचि सांख्यान
शिमला। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल वाहन बेचने का समझौता (एग्रीमेंट टू सेल) होने से मूल मालिक का बीमा योग्य हित समाप्त नहीं होता। विशेषकर तब जब बिक्री की पूरी रकम का भुगतान न हुआ हो और वाहन का पंजीकरण प्रमाण पत्र (आरसी) भी मूल मालिक के नाम पर ही दर्ज हो।

आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति इंद्र सिंह मेहता और सदस्य योगिता दत्ता की पीठ ने जिला उपभोक्ता आयोग कुल्लू के आदेश को निरस्त करते हुए आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी को शिकायतकर्ता को 4,35,146.44 (4.35 लाख) रुपये की बीमा राशि नौ फीसदी वार्षिक ब्याज सहित अदा करने का आदेश दिया है। इसके अलावा बीमा कंपनी को मानसिक प्रताड़ना के एवज में 25 हजार रुपये क्षतिपूर्ति और 10 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में भी 45 दिन के भीतर चुकाने के निर्देश दिए हैं।
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कुल्लू निवासी प्रेम कुमार ने अपनी महिंद्रा स्कॉर्पियो का बीमा आईसीआईसीआई लोम्बार्ड से 6,68,572 रुपये की आईडीवी पर 14 जुलाई 2020 से 13 जुलाई 2021 तक की अवधि के लिए करवाया था। यह वाहन पंजाब नेशनल बैंक से फाइनेंस्ड था। बीमा अवधि के दौरान 8 दिसंबर 2020 को वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया। दुर्घटना की सूचना बीमा कंपनी को दी गई जिसके बाद नियुक्त सर्वेयर ने मरम्मत के आधार पर 4,35,146 रुपये के नुकसान का आकलन किया था।
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बीमा कंपनी ने 28 अप्रैल 2021 को यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि प्रेम कुमार ने दुर्घटना से पहले 2 मई 2020 को यह गाड़ी लाहौल-स्पीति निवासी सुख दयाल को बेच दी थी। इसलिए हादसे के दिन वाहन पर उनका कोई बीमा योग्य हित शेष नहीं था। इसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने जिला उपभोक्ता आयोग कुल्लू का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से भी शिकायत खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की। राज्य उपभोक्ता आयोग ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि वाहन का सौदा 8.50 लाख रुपये में हुआ था लेकिन खरीदार ने केवल 1.40 लाख रुपये पेशगी के रूप में दिए थे और शेष राशि तथा बैंक की किस्तें अदा नहीं की थीं। समझौते की शर्त के अनुसार किस्तें न चुकाने पर गाड़ी का कब्जा वापस लेने का अधिकार भी मूल मालिक के पास था। दुर्घटना की तारीख तक गाड़ी की आरसी और बीमा पॉलिसी दोनों प्रेम कुमार के नाम पर ही थीं। आयोग ने व्यवस्था दी कि जब तक पूरी रकम का भुगतान न हो और पंजीकरण स्थानांतरित न किया जाए तब तक बिक्री प्रक्रिया पूर्ण नहीं मानी जा सकती।
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