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कैदियों का जीवन सुधारने को समर्पित कर दी जिंदगी
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
Updated Sun, 08 Mar 2015 11:10 AM IST
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घर-परिवार संभालने के साथ पहाड़ की महिलाएं समाज के लिए मिसाल भी कायम कर रही हैं। एक ऐसा ही उदाहरण पेश किया है शिमला की सरोज वशिष्ठ ने। आल इंडिया रेडियो में उदघोषिका रहीं सरोज करीब दो दशक से कैदियों का जीवन संवारने में जुटी हैं।
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किरण बेदी की प्रेरणा से वर्ष 1993 में शुरू हुआ उनका यह अभियान 86 साल की उम्र में अब भी जारी है। वे नियमित जेलों में जाकर न केवल कैदियों को पढ़ाती हैं, बल्कि उन्हें जीवन को नए सिरे से शुरू करने के लिए भी प्रेरित करती हैं। मुफ्त किताबें बांटने से लेकर सरोज वशिष्ठ कैदियों और उनके परिवार के बीच सेतु का भी काम कर रही हैं।
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मूलत: लेखिका सरोज वशिष्ठ नाटक और कविताओं के जरिए कैदियों के जीवन में रंग भरने का प्रयास करती हैं। कैदियों के साथ उनके रिश्तों का आलम ये है कि अपने स्व. पति को मुखाग्नि भी उन्होंने तिहाड़ जेल के कैदी से दिलाई थी। वह कैदियों की लिखीं चार पुस्तकें संपादित और प्रकाशित कर चुकी हैं। कई पुरस्कारों से नवाजी जा चुकीं सरोज वशिष्ठ का कहना है कि वो हर दिन को महिला दिवस मानती हैं।
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