अंधेर नगरी में अवैध भवनों को वैध बनाने के इस अंधे कानून का क्या करें?
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अंधेर नगरी प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार भारतेन्दु हरिशचंद्र का सर्वाधिक लोकप्रिय नाटक है। इस मशहूर नाटक में भारतेन्दु ने विवेकहीन और निरंकुश शासन व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए उसे अपने ही कर्मों से नष्ट होते दिखाया गया है।
पता नहीं क्यों सूबे के अवैध भवनों को नियमित करने का जो नया कानून आया तो यही नाटक ख्याल में आ गया। आप अगर जरा भी संवेदनशील हैं तो उन हजारों जिम्मेदार शहरियों का दर्द समझ सकते हैं जिन्होंने नियम कानून के मुताबिक सरकार से नक्शा पास कर अपना छोटा सा घरौंदा बनाया।
अब सब ठगे से बैठे हैं। वे अपने पड़ोसी के अवैध और मनमाने ढंग से बने आलीशान महल को देखकर रश्क कर रहे होंगे जो मामूली सी रकम चुका कर उसका मालिक हो जाएगा। उसके माथे से शहर को बदसूरत बनाने का कलंक सरकार ने खुद धो दिया।
ऐसे दौर में जब पूरे देश में तमाम राज्य स्मार्ट सिटी बनाने का ख्वाब बुन रहे हों, अवैध निर्माण को वैध करने का फरमान जारी करना हास्यास्पद नहीं बल्कि चिंता की बात है। वह भी हिमाचल जैसे राज्य में जो हमेशा भूकंप और भूस्खलन की रडार पर रहता है।
वास्तु शात्रियों ने बड़ी रिसर्च के बाद मानक तय किया था कि हिमाचल पहाड़ी राज्य में अधिक से अधिक 65 डिग्री एंगल में भवन का निर्माण हो सकता है जबकि हिमाचल में पहाड़ों को काटकर 90 डिग्री एंगल तक लोगों ने घर बनवा लिए, जो खतरनाक है।
सरकार को चुनाव की चिंता, गिर रहे भवन
हिमाचल में ऐसे हजारों भवन मालिक हैं, जिन्होंने तीन मंजिलों के भवन स्वीकृत कराए थे। अब उन लोगों ने 6-6 मंजिलें ऊपर चढ़ा दी हैं। टीसीपी यानी टाउन एंड कंट्री प्लानिंग का मानना है कि लोगों ने नींव 3 मंजिलों के हिसाब से बनाई है।
अतिरिक्त भार पड़ने से जमीन खिसक रही है, जिससे भवन गिर रहे हैं। रोहडू़ में परसों भवन ढहने की यही वजह सामने आई है। सात रिक्टर स्केल पर आया भूकंप का एक झटका ताश के पत्तों की तरह पूरे शहर को बिखेर देगा।
घर बनाते वक्त लोगों को अपने प्लाट के चारों तरफ जगह छोड़नी चाहिए। हिमाचल के नियम के मुताबिक चार बिस्वा प्लॉट पर फ्रंट साइड से दो मीटर जबकि अन्य तीन किनारों से डेढ़-डेढ़ मीटर जगह छोड़नी होती है ताकि इस जगह से सीवरेज, पानी और बिजली की तारें ले जा सकें।
अब सरकार ऐसे भवनों को भी नियमित करने जा रही है, जिन्होंने यह जगह नहीं छोड़ी है। ऐसे में न तो इन इलाकों में सीवर लाइन बिछ पाएगी, न ही दूसरी आधारभूत सुविधाएं मुहैया हो पाएंगी। मौजूदा सरकार ने पहले एलान किया था कि 70 फीसदी तक डेविएशन को रेगुलर कर दिया जाएगा।
सेट बैक पर कम से कम 30 फीसदी जगह खाली होनी चाहिए ताकि इस जगह से सीवर लाइन आदि बिछाई जा सके। भाजपा इसका विरोध करने लगी तो राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में सरकार जैसा है वैसा की नीति ले आई। यानी अंधेरगर्दी की पूरी छूट। आने वाली पीढ़ी की किसी को कोई चिंता नहीं। सरकार को सिर्फ अगले साल होने वाला विधानसभा चुनाव दिख रहा है।
20 साल से जारी है ये खेल
यह सिलसिला पिछले करीब बीस साल से जारी है। सूबे में पहली बार कांग्रेस 8 अप्रैल, 1997 को अवैध निर्माण को नियमित कराने की पॉलिसी लाई थी। 2007 में भाजपा की सरकार आई। उसने भी अवैध भवनों को वैध करने का खेल जारी रखा।
यानी सूबे को बर्बाद करने के इस खेल में सब शामिल हैं। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से पहले हिमाचल के अवैध भवनों को नियमित करने का वायदा अपने घोषणा पत्र में किया था। सरकार ने वादा निभा दिया। अब सरकार ने नगर निगम और नगर निकाय में 800 रुपये प्रति वर्ग मीटर जबकि टीसीपी एरिया में 400 रुपये प्रतिवर्ग मीटर के हिसाब से भवन नियमित करने की फीस तय कर दी है।
इसी तरह जिन लोगों ने बिना नक्शे के भवन बनाए हैं, उन भवनों को नियमित करने के लिए नगर निगम और नगर निकाय में 1200 रुपये जबकि टीसीपी में 600 रुपये प्रतिवर्ग मीटर के हिसाब से भवन नियमित कराने का फैसला लिया गया है। एक आकलन के मुताबिक सूबे के शहरों में अवैध ढंग से या बिना नक्शा पास बने कोई तीस हजार घर हैं। अब ये सारे अवैध भवन बड़ी आसानी से वैध हो जाएंगे।
यह कानून न केवल पर्यावरण के मूलभूत सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाता है बल्कि शिमला या धर्मशाला को स्मार्ट सिटी बनाने के सपने का मजाक भी उड़ाता है। यह हजारों परिवारों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है, जिसका नतीजा कभी भी देखने को मिल सकता है। यह मामला हाईकोर्ट तक गया था। कोर्ट ने भी साफ कहा था कि ये सब गलत है। सरकार इस तरह की अनैतिक नीति बनाकर मनमानी नहीं कर सकती।
लेकिन इस देश का संविधान विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार देता है। और इस शामिल बाजा में जब पक्ष और विपक्ष देनों एक हो जाएं तो उस राज्य का ईश्वर ही मालिक है। तो क्या आप ऐसा ही लोकतंत्र चाहते हैं जिसमें अंधा कानून बने और कोई विरोध न हो। चुनाव आपको करना है। अपने नाटक में भारतेन्दु एक मजेदार सलाह देते हैं- सेत सेत सब एक से, जहां कपूर कपास। ऐसे देश कुदेस में, कबहूं न कीजै बास।