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Shimla News: ग्रामीण क्षेत्रों में माहवारी पर अब भी हावी हैं सामाजिक कुरीतियां
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एचपीयू के शोध में खुलासा, हर दूसरी किशोरी झेल रही सामाजिक पाबंदियां, पूजा कक्ष जाने पर रहती है रोक
71.5 फीसदी को स्नान से पहले रसोई में नहीं मिलता प्रवेश
एक्सक्लूसिव
हर्षित शर्मा
शिमला। शिक्षा और स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों के बावजूद शिमला जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में माहवारी को लेकर सामाजिक वर्जनाएं (सामाजिक कुरीतियां) अब भी मौजूद हैं।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला के समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग के अध्ययन में सामने आया है कि शोध में शामिल लगभग हर दूसरी किशोरी माहवारी के दौरान घर में किसी न किसी प्रकार की सामाजिक पाबंदी का सामना करती है।यह शोध वर्ष 2023-24 के दौरान छौहारा विकास खंड के तीन शिक्षा खंडों के 12 सरकारी विद्यालयों में किया गया। इसमें नौवीं से बारहवीं कक्षा तक की छात्राओं के साक्षात्कार लिए गए। अध्ययन के अनुसार 48.9 प्रतिशत छात्राओं ने बताया कि उनके घरों में माहवारी के दौरान सामाजिक पाबंदियां लागू होती हैं। प्रभावित छात्राओं में 90.9 प्रतिशत को पूजा कक्ष में जाने से रोका जाता है। 71.5 प्रतिशत को स्नान से पहले रसोई में प्रवेश नहीं मिलता। 62.4 प्रतिशत को घर की छत पर जाने की अनुमति नहीं होती जबकि 32.8 प्रतिशत को भोजन बनाने से रोका जाता है।
कुछ छात्राओं ने दही, अचार और लस्सी जैसे खाद्य पदार्थों के सेवन तथा बीज छूने पर भी रोक की जानकारी दी। शोधकर्ताओं के अनुसार, ये प्रतिबंध केवल धार्मिक परंपराओं का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि किशोरियों के आत्मविश्वास, गरिमा और सामाजिक भागीदारी को भी प्रभावित करते हैं। यह शोध हेल्थ एंड पॉपुलेशन: पर्सपेक्टिव्स एंड इश्यूज पत्रिका के जनवरी-मार्च 2026 अंक (खंड 49, अंक 1) में प्रकाशित हुआ है। हिमाचल विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग के डॉ. अश्वनी कुमार और आराधना पितान ने शिमला जिले के छौहारा विकास खंड में स्कूली किशोरियों पर यह अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में वैज्ञानिक जानकारी बढ़ने के बावजूद सामाजिक व्यवहार में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है। परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं आज भी किशोरियों के दैनिक जीवन और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं।
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अंधविश्वास और मिथकों का गहरा असर
अध्ययन में कई सामाजिक मान्यताएं भी सामने आईं। 37.9 प्रतिशत छात्राओं ने बताया कि वह माहवारी के दौरान बहते पानी के पास नहीं जातीं। कई छात्राओं ने इसका कारण जल स्रोतों के पास देवी-देवताओं या नाग देवता का वास बताया। 18.4 प्रतिशत छात्राओं ने कहा कि उन्हें इन दिनों अलग कमरे में रखा जाता है। 35 प्रतिशत छात्राओं ने इस्तेमाल किए सेनेटरी पैड के निस्तारण को लेकर सामाजिक वर्जनाओं की जानकारी दी। वहीं 40.3 प्रतिशत छात्राओं ने यह धारणा व्यक्त की कि यदि गाय इस्तेमाल किया हुआ सेनेटरी पैड खा ले तो भविष्य में मां बनने में बाधा आ सकती है। शोध में इसे ग्रामीण समाज में प्रचलित सामाजिक विश्वास के रूप में दर्ज किया गया है, न कि वैज्ञानिक तथ्य के रूप में।
माहवारी पर खुलकर बात करने में झिझक कायम
अध्ययन में यह सामने आया कि माहवारी पर खुला संवाद अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। 83.7 प्रतिशत छात्राओं ने बताया कि वह परिवार के पुरुष सदस्यों से माहवारी पर खुलकर बात नहीं करतीं। इनमें 57.4 प्रतिशत छात्राएं परिवार के किसी भी पुरुष सदस्य से इस विषय पर चर्चा करने में झिझकती हैं। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि सामाजिक चुप्पी और संवाद की कमी मिथकों को बनाए रखने का बड़ा कारण है।
माहवारी पर खानपान का असर नहीं : महाजन
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. आरजे महाजन ने माहवारी से जुड़ी कई पुरानी और अवैज्ञानिक धारणाओं को खारिज किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि माहवारी के दौरान खानपान का कोई विशेष नकारात्मक असर नहीं होता है। महाजन ने बताया कि माहवारी कोई बीमारी नहीं है और इससे संक्रमण नहीं फैलता है। समाज में माहवारी को लेकर कई ऐसी बातें प्रचलित हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। माहवारी के दिनों में व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना बेहद जरूरी है। संक्रमण से बचने के लिए सफाई के दौरान सामान्य पानी का उपयोग करना चाहिए। सेनेटरी पैड का नियमित उपयोग करना चाहिए।
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71.5 फीसदी को स्नान से पहले रसोई में नहीं मिलता प्रवेश
एक्सक्लूसिव
हर्षित शर्मा
शिमला। शिक्षा और स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों के बावजूद शिमला जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में माहवारी को लेकर सामाजिक वर्जनाएं (सामाजिक कुरीतियां) अब भी मौजूद हैं।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला के समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग के अध्ययन में सामने आया है कि शोध में शामिल लगभग हर दूसरी किशोरी माहवारी के दौरान घर में किसी न किसी प्रकार की सामाजिक पाबंदी का सामना करती है।यह शोध वर्ष 2023-24 के दौरान छौहारा विकास खंड के तीन शिक्षा खंडों के 12 सरकारी विद्यालयों में किया गया। इसमें नौवीं से बारहवीं कक्षा तक की छात्राओं के साक्षात्कार लिए गए। अध्ययन के अनुसार 48.9 प्रतिशत छात्राओं ने बताया कि उनके घरों में माहवारी के दौरान सामाजिक पाबंदियां लागू होती हैं। प्रभावित छात्राओं में 90.9 प्रतिशत को पूजा कक्ष में जाने से रोका जाता है। 71.5 प्रतिशत को स्नान से पहले रसोई में प्रवेश नहीं मिलता। 62.4 प्रतिशत को घर की छत पर जाने की अनुमति नहीं होती जबकि 32.8 प्रतिशत को भोजन बनाने से रोका जाता है।
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कुछ छात्राओं ने दही, अचार और लस्सी जैसे खाद्य पदार्थों के सेवन तथा बीज छूने पर भी रोक की जानकारी दी। शोधकर्ताओं के अनुसार, ये प्रतिबंध केवल धार्मिक परंपराओं का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि किशोरियों के आत्मविश्वास, गरिमा और सामाजिक भागीदारी को भी प्रभावित करते हैं। यह शोध हेल्थ एंड पॉपुलेशन: पर्सपेक्टिव्स एंड इश्यूज पत्रिका के जनवरी-मार्च 2026 अंक (खंड 49, अंक 1) में प्रकाशित हुआ है। हिमाचल विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग के डॉ. अश्वनी कुमार और आराधना पितान ने शिमला जिले के छौहारा विकास खंड में स्कूली किशोरियों पर यह अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में वैज्ञानिक जानकारी बढ़ने के बावजूद सामाजिक व्यवहार में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है। परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं आज भी किशोरियों के दैनिक जीवन और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं।
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अंधविश्वास और मिथकों का गहरा असर
अध्ययन में कई सामाजिक मान्यताएं भी सामने आईं। 37.9 प्रतिशत छात्राओं ने बताया कि वह माहवारी के दौरान बहते पानी के पास नहीं जातीं। कई छात्राओं ने इसका कारण जल स्रोतों के पास देवी-देवताओं या नाग देवता का वास बताया। 18.4 प्रतिशत छात्राओं ने कहा कि उन्हें इन दिनों अलग कमरे में रखा जाता है। 35 प्रतिशत छात्राओं ने इस्तेमाल किए सेनेटरी पैड के निस्तारण को लेकर सामाजिक वर्जनाओं की जानकारी दी। वहीं 40.3 प्रतिशत छात्राओं ने यह धारणा व्यक्त की कि यदि गाय इस्तेमाल किया हुआ सेनेटरी पैड खा ले तो भविष्य में मां बनने में बाधा आ सकती है। शोध में इसे ग्रामीण समाज में प्रचलित सामाजिक विश्वास के रूप में दर्ज किया गया है, न कि वैज्ञानिक तथ्य के रूप में।
माहवारी पर खुलकर बात करने में झिझक कायम
अध्ययन में यह सामने आया कि माहवारी पर खुला संवाद अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। 83.7 प्रतिशत छात्राओं ने बताया कि वह परिवार के पुरुष सदस्यों से माहवारी पर खुलकर बात नहीं करतीं। इनमें 57.4 प्रतिशत छात्राएं परिवार के किसी भी पुरुष सदस्य से इस विषय पर चर्चा करने में झिझकती हैं। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि सामाजिक चुप्पी और संवाद की कमी मिथकों को बनाए रखने का बड़ा कारण है।
माहवारी पर खानपान का असर नहीं : महाजन
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. आरजे महाजन ने माहवारी से जुड़ी कई पुरानी और अवैज्ञानिक धारणाओं को खारिज किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि माहवारी के दौरान खानपान का कोई विशेष नकारात्मक असर नहीं होता है। महाजन ने बताया कि माहवारी कोई बीमारी नहीं है और इससे संक्रमण नहीं फैलता है। समाज में माहवारी को लेकर कई ऐसी बातें प्रचलित हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। माहवारी के दिनों में व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना बेहद जरूरी है। संक्रमण से बचने के लिए सफाई के दौरान सामान्य पानी का उपयोग करना चाहिए। सेनेटरी पैड का नियमित उपयोग करना चाहिए।