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अध्ययन में खुलासा: अपना रंग बदलकर पर्यावरण प्रदूषण का संकेत देते हैं घोंघे

Fri, 11 Feb 2022 11:16 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Fri, 11 Feb 2022 11:16 AM IST
सार

घोंघे अपना रंग और व्यवहार बदलकर पर्यावरण में जहरीली गैसें घुलने का समय पर संकेत देते हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के पर्यावरण विज्ञान विभाग के विशेषज्ञों के अध्ययन से यह बात सामने आई है। यह अध्ययन पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. दीपक पंत ने अपने शोध विद्यार्थी वरुण धीमान के साथ मिलकर किया है। 

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snails indicate environmental pollution by changing their color, revealed in central university dharamshala Study
घोघों पर शोध करते वैज्ञानिक - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 हिमाचल प्रदेश में पाए जाने वाले घोंघे अपना रंग और व्यवहार बदलकर पर्यावरण में जहरीली गैसें घुलने का समय पर संकेत देते हैं। पर्यावरण प्रदूषण का संकेत ये उस वक्त दे देते हैं, जिस समय जहरीली गैसें मनुष्य, पशुओं या अन्य जीवों के लिए कम घातक होती हैं। ये मिट्टी में कीटनाशकों या अन्य रसायनों के घुलने से होने वाले दुष्प्रभाव का भी समय पर संकेत देते हैं। यह बात साफ है कि जहां स्वस्थ घोंघे होंगे, वहां जीने योग्य वातावरण होगा। केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के पर्यावरण विज्ञान विभाग के विशेषज्ञों के अध्ययन से यह बात सामने आई है। यह अध्ययन पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. दीपक पंत ने अपने शोध विद्यार्थी वरुण धीमान के साथ मिलकर किया है। 

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इन विशेषज्ञों का दावा है कि स्नेल यानी घोंघे पर्यावरण में आए बदलाव के संकेतकों के रूप में इस्तेमाल हो सकते हैं। ये घोंघे किसी भी विपरीत मौसम, जलवायु या वातावरण में परिवर्तन सबसे पहले अपनी प्रतिक्रिया से देते हैं। डॉ. पंत ने बताया कि अलग-अलग धातुओं के हवा में घुलने से हुए प्रदूषण से इन पर सीधा असर होता है। जहरीली धातुओं की वातावरण में मौजूदगी पर इसकी पीठ के खोल का रंग बदल जाता है। इस खोल के साथ धातुओं की तीव्र प्रतिक्रिया होती है। कीटनाशकों के अवशेष और अन्य कारणों से होने वाले जैविक प्रदूषण पर ये अंडे देना बंद कर देते हैं और अपना स्वभाव बदल देते हैं। ये जमीन के पूरी तरह से खराब होने से पहले ही इसके संकेत दे देते हैं।
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कांच के पॉलीहाउस बनाकर किया प्रयोग 
डॉ. दीपक पंत ने बताया कि घोंघों पर यह प्रयोग कांच के पॉलीहाउस बनाकर किया गया है। उन्हें प्रदूषण की अलग-अलग डोज दी गई। यह अध्ययन बगीचों में पाए जाने वाले घोंघों यानी गार्डन स्नेल पर हुआ है। इसके भीतर के वातावरण में कॉपर, आयरन, आर्सेनिक जैसी धातुएं घोली गईं तो इनकी पीठ के खोल गहरे रंग के हो गए। जमीन पर कीटनाशकों या अन्य ऑर्गेनिक रसायनों का प्रयोग किया तो इनका हैचिंग पैटर्न बदल गया। इन्होंने अंडे देने या तो बिलकुल बंद किए या फिर नाममात्र के ही दिए और ये पहले से ज्यादा सुस्त हो गए। इस तरह से इनके व्यवहार में अंतर देखा गया। 
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घोंघों में बहुत अधिक जैव विविधता 
घोंघों में बहुत अधिक जैव विविधता होती है। इनका रंग-रूप और व्यवहार अलग-अलग वातावरण में अलग हो जाता है। हिमाचल प्रदेश में पाए जाने वाले इन घोंघों की भी इसीलिए स्वाभाविक रूप से अलग विशेषताएं हैं। 

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