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यहां हौसलों से उड़ान भर रहे छह दिव्यांग युवक, चला रहे कैंटीन

Wed, 18 Apr 2018 12:53 PM IST
शशिभूषण पुरोहित, अमर उजाला, ऊना
शशिभूषण पुरोहित, अमर उजाला, ऊना Updated Wed, 18 Apr 2018 12:53 PM IST
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six divyang are running canteen at una dc office

दिव्यांग शब्द सुनते ही आपके जहन में क्या तस्वीर बनती है? बेबस और बेसहारा..., जिसको दुनिया की सहानुभूति के साथ जीना पड़ता है, लेकिन इस सोच को गलत साबित कर रहे हैं ऊना  में ‘पहल’ कैंटीन चला रहे छह दिव्यांग। 

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इनमें से किसी के पास देखने तो किसी के पास सुनने की क्षमता नहीं, लेकिन जब आप इनसे मिलेंगे और इन्हें काम करते देखेंगे तो दिव्यांगों के प्रति आपकी धारणा बिल्कुल बदल जाएगी। 
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उपायुक्त दफ्तर ऊना के सहयोग से ‘पहल’ कैंटीन संचालित कर रहे इन युवाओं ने साबित कर दिखाया है कि विकलांगता केवल दिमाग की उपज है। अगर आपमें कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो मंजिलें खुद आसान हो जाती हैं। 
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उपायुक्त विकास लाबरू की पहल से नेशनल कॅरिअर सर्विस सेंटर (एनसीएसई) के सौजन्य से संचालित ‘पहल’ कैंटीन यहां काम करने वाले दिव्यांगों की तस्वीर और तकदीर बदलने लगी है।

काम के प्रति देखते ही बनता है जज्बा

six divyang are running canteen at una dc office

‘अमर उजाला’ ने जब इन युवाओं से बात की तो काम के प्रति इनका जज्बा देखते ही बन रहा था। आईआरडीपी परिवार से संबंधित देश राज की आंखों की 40 प्रतिशत रोशनी नहीं है, लेकिन उसके हाथों से बने समोसे अच्छे से अच्छे हलवाई को फेल कर देते हैं।

देशराज कैंटीन में बतौर कुक काम संभाल रहा है। दसवीं कक्षा के दौरान पूरी तरह से आंखों की रोशनी खो चुका देहलां   का अमनदीप बतौर हेल्पर सेवारत है। उसका काम देख कर कोई यह नहीं कह सकता कि अमन पूरी तरह से दृष्टिबाधित है।

प्राथमिक कक्षा तक पढ़े खुरवाईं के पंकज की सुनने की क्षमता सिर्फ 25 प्रतिशत है। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ा पंकज कान के नजदीक बहुत ऊंची आवाज करने पर थोड़ा-बहुत सुन पाता है, लेकिन उसका काम देखते ही बनता है। बोलने में भी अक्षम पंकज इशारों में कहता है कि उसकी जिंदगी अब बदलने लगी है। 
शारीरिक रूप से 42 प्रतिशत दिव्यांग राजेश कुमार कैंटीन का कैश काउंटर पूरी कुशलता के साथ संभालता है। बतौर हेल्पर सेवाएं दे रहे मनोज की मां बीमार रहती हैं।

मनोज ने बताया कि इस कैंटीन से वह न केवल अपना बल्कि मां की दवाइयों का खर्च भी निकाल रहा है। तीन भाई-बहन में सबसे बड़ा शिव कुमार जन्म से ही दिव्यांग है। शिव कुमार चाय की सर्विस का काम बड़ी कुशलता से करता है। 

डीसी ऑफिस से मिले पूरा ऑर्डर तो बढ़े आय

six divyang are running canteen at una dc office

यूं तो कैंटीन डीसी ऑफिस के सहयोग से संचालित है, लेकिन यहां काम करने वाले सदस्यों ने बताया कि अधिकांश बड़ी बैठकों पर चाय आदि का ऑर्डर उन्हें नहीं मिलता। अगर डीसी ऑफिस से जुड़े अन्य कार्यालयों में होने वाली बैठकों के उन्हें चाय आदि के आर्डर मिलें तो आय में बढ़ोतरी होगी।

उपायुक्त विकास लाबरू का कहना है कि वह अन्य विभागों को भी कैंटीन की सेवाएं लेने के लिए कहेंगे। उन्होंने कहा कि यह कैंटीन स्वयं मेें एक आदर्श स्थापित करेगी।

नेशनल कॅरिअर सर्विस सेंटर के उपनिदेशक एवं प्रभारी डॉ. बीके पांडेय ने बताया कि कैंटीन में काम करने वाले सभी दिव्यांगों को इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग एंड न्यूट्रीशियन कुफरी शिमला से विशेष प्रशिक्षण दिलाया गया है। प्रशिक्षण के बाद सभी सदस्य किसी भी सामान्य व्यक्ति की तरह काम कर रहे हैं।

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