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हिमाचल: शिमला में दुष्कर्म-पॉक्सो केस में बड़ा फैसला, पति समेत सास-ससुर बरी; पीड़िता की उम्र पर उठे सवाल

Wed, 09 Sep 2026 09:52 AM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Wed, 09 Sep 2026 09:52 AM IST
सार

शिमला की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के मामले में पति, ससुर और सास को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की घटना के समय उम्र को नाबालिग साबित करने में विफल रहा। सुनवाई के दौरान पीड़िता अपने पूर्व बयानों से मुकर गई और उसने जन्मतिथि 17 नवंबर 2004 बताई। बचाव पक्ष ने भी मां के पुराने शपथ पत्र पेश किए, जिनमें यही जन्मतिथि दर्ज थी।

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shimla pocso case husband in laws acquitted minor age not proved
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (पॉक्सो/दुष्कर्म) शिमला के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विवेक शर्मा की अदालत ने नाबालिग से दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी पति, उसके पिता और मां यानी पीड़िता के ससुर और सास को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत के सामने मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल पीड़िता की घटना के समय उम्र को लेकर था। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष यह बुनियादी तथ्य साबित नहीं कर सका कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।

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मामले के अनुसार ढली थाना में दर्ज प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि राजगढ़, सिरमौर निवासी आरोपी ने वर्ष 2023 में नाबालिग को बहला-फुसलाकर भगाया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद पीड़िता ने एक बच्ची को जन्म दिया था। मामले में आरोपी के माता-पिता पर भी धमकाने और बेटे का सहयोग करने के आरोप लगाए गए थे।
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मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता अपने पहले के बयानों से मुकर गई। उसने अदालत के समक्ष बताया कि उसका जन्म 17 नवंबर 2004 को हुआ था। पीड़िता के अनुसार उसने बालिग होने के बाद वर्ष 2024 में अपनी इच्छा से आरोपी से शादी की थी। उसने अदालत को यह भी बताया कि दोनों परिवारों के बीच विवाद के चलते वह अपने मायके चली गई थी, लेकिन अब वह अपने पति के साथ खुशी से रह रही है।

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बचाव पक्ष की ओर से अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों ने भी पीड़िता की उम्र को लेकर अभियोजन के मामले पर सवाल खड़े किए। दस्तावेजों के मुताबिक पीड़िता की मां ने पहले एसडीएम और तहसीलदार के समक्ष दिए शपथ पत्रों में उसकी जन्मतिथि 17 नवंबर 2004 दर्ज की थी। इसके अलावा पंचायत के जन्म रजिस्टर में भी पीड़िता के जन्म से संबंधित कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।

अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और सामने आए विरोधाभासों का परीक्षण करने के बाद माना कि अभियोजन पक्ष पीड़िता को घटना के समय नाबालिग साबित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। नाबालिग होने का तथ्य साबित नहीं होने से पॉक्सो एक्ट के आरोपों का आधार भी कमजोर पड़ गया। इन परिस्थितियों और अभियोजन के मामले में मौजूद महत्वपूर्ण कमियों को देखते हुए अदालत ने पति, ससुर और सास को दोषमुक्त करार देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया।
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