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Shimla News: मधुबनी और वर्ली साड़ियों ने मोहा महिलाओं का मन
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गेयटी के कला एवं शिल्प मेले में पारंपरिक हस्तकला का दिखी ग्रामीण जीवन की झलक
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। गेयटी थियेटर के टेवरन हॉल में कला एवं शिल्प मेले में इस बार मधुबनी और वर्ली कला से बनी साड़ियां महिलाओं की पहली पसंद बनी हैं। मेले में पहुंचने वाली महिलाएं इन साड़ियों की पारंपरिक डिजाइन, बारीक हस्तचित्रकारी और भारतीय संस्कृति की झलक को खूब सराह रही हैं।
मेले में मधुबनी कला के सूट 1,800 रुपये, मधुबनी साड़ियां 3,500 रुपये और वर्ली आर्ट के सूट 1,500 से 3,500 रुपये तक की कीमत में उपलब्ध हैं। मेले में झारखंड और बिहार के स्टॉल पर दिनभर महिलाओं की भीड़ लगी रही है। झारखंड से मेले में पहुंचे कारीगर शबीर ने बताया कि मधुबनी और वर्ली कला भारत की समृद्ध लोक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। मधुबनी साड़ियां अपनी जटिल और रंगीन चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध हैं जिनमें प्रकृति, देवी-देवताओं, लोक जीवन और सामाजिक परंपराओं को खूबसूरती से उकेरा जाता है। वहीं वर्ली कला की साड़ियां अपनी सरल ज्यामितीय आकृतियों और आदिवासी जीवन शैली के चित्रण के कारण विशेष पहचान रखती हैं। उन्होंने बताया कि इन साड़ियों को तैयार करने में कई बार हफ्तों का समय लग जाता है। प्रत्येक साड़ी पूरी तरह हस्तनिर्मित होती है। बिहार के भागलपुर के आए कारीगर सारिक और मोहम्मद अजहार ने बताया कि इन साड़ियों पर उकेरे गए चित्र भारतीय गांवों के दैनिक जीवन, खेतीबाड़ी, लोक संस्कृति और पारंपरिक जीवन शैली की कहानी बयां करते हैं।
आयोजकों का कहना है कि मेले का उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों के कारीगरों को मंच उपलब्ध कराना और उनकी पारंपरिक कला को नई पहचान दिलाना है। फैमको हैंडलूम कोऑपरेटिव सोसायटी की ओर से आयोजित यह मेला 31 जुलाई तक चलेगा।
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शिमला। गेयटी थियेटर के टेवरन हॉल में कला एवं शिल्प मेले में इस बार मधुबनी और वर्ली कला से बनी साड़ियां महिलाओं की पहली पसंद बनी हैं। मेले में पहुंचने वाली महिलाएं इन साड़ियों की पारंपरिक डिजाइन, बारीक हस्तचित्रकारी और भारतीय संस्कृति की झलक को खूब सराह रही हैं।
मेले में मधुबनी कला के सूट 1,800 रुपये, मधुबनी साड़ियां 3,500 रुपये और वर्ली आर्ट के सूट 1,500 से 3,500 रुपये तक की कीमत में उपलब्ध हैं। मेले में झारखंड और बिहार के स्टॉल पर दिनभर महिलाओं की भीड़ लगी रही है। झारखंड से मेले में पहुंचे कारीगर शबीर ने बताया कि मधुबनी और वर्ली कला भारत की समृद्ध लोक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। मधुबनी साड़ियां अपनी जटिल और रंगीन चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध हैं जिनमें प्रकृति, देवी-देवताओं, लोक जीवन और सामाजिक परंपराओं को खूबसूरती से उकेरा जाता है। वहीं वर्ली कला की साड़ियां अपनी सरल ज्यामितीय आकृतियों और आदिवासी जीवन शैली के चित्रण के कारण विशेष पहचान रखती हैं। उन्होंने बताया कि इन साड़ियों को तैयार करने में कई बार हफ्तों का समय लग जाता है। प्रत्येक साड़ी पूरी तरह हस्तनिर्मित होती है। बिहार के भागलपुर के आए कारीगर सारिक और मोहम्मद अजहार ने बताया कि इन साड़ियों पर उकेरे गए चित्र भारतीय गांवों के दैनिक जीवन, खेतीबाड़ी, लोक संस्कृति और पारंपरिक जीवन शैली की कहानी बयां करते हैं।
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आयोजकों का कहना है कि मेले का उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों के कारीगरों को मंच उपलब्ध कराना और उनकी पारंपरिक कला को नई पहचान दिलाना है। फैमको हैंडलूम कोऑपरेटिव सोसायटी की ओर से आयोजित यह मेला 31 जुलाई तक चलेगा।
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