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Shimla News: पाकिस्तान से लेकर हिमाचल तक इस्तेमाल होती थी शारदा लिपि
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गेयटी में चल रही कार्यशाला में दूसरे दिन सिखाई लिपि की वर्णमाला, शारदा लिपि में लिखे गए हैं कई ग्रंथ
कश्मीर की शारदा पीठ से निकली शारदा लिपि : नीलम राजदान
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। सरहदों में बंट चुके कई देशों में कभी एक ही लिपि का इस्तेमाल ग्रंथों को लिखने में होता। पाकिस्तान और अफगानिस्तान से लेकर हिमाचल तक शारदा लिपि में कई ग्रंथ लिखे गए हैं।
यह जानकारी राजधानी के गेयटी थियेटर के सम्मेलन कक्ष में शारदा लिपि पर चल रही कार्यशाला में नीलम राजदान ने दी। नीलम मुंबई विश्वविद्यालय से प्रबंधन अध्ययन में स्नातकोत्तर हैं। कार्यशाला में बुधवार को वर्णमाला सिखाई गई। वक्ताओं ने बताया कि 14वीं शताब्दी तक पाकिस्तान से लेकर हिमाचल और पंजाब तक शारदा लिपि का इस्तेमाल होता था। कार्यशाला में प्रशिक्षुओं को पांडुलिपियों का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। कार्यशाला में ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से लोग लिपि सीख रहे हैं। कार्यशाला भाषा-संस्कृति विभाग और राजीव गांधी राजकीय महाविद्यालय चौड़ा मैदान के सहयोग से आयोजित की जा रही है। कार्यशाला के दूसरे दिन हिमाचल सहित संपूर्ण उतर-पश्चिम भारत की प्राचीन शारदा लिपि के संदर्भ में पहले सत्र में लिपि की उत्पत्ति और इतिहास के बारे में जानकारी दी गई। नीलम राजदान ने बताया कि उन्होंने जम्मू विश्वविद्यालय से शारदा लिपि का कोर्स किया है। शारदा लिपि कश्मीर मंडल में शारदा पीठ (प्रमुख विद्या का स्थान) से निकली है। वहीं वाराणसी के नालंदा में देवनागरी लिपि की उत्पत्ति हुई है। इन दोनों का मूल ब्राह्मी लिपि है।
प्राचीन समय में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कश्मीर, दिल्ली, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में शारदा लिपि लिखी और समझी जाती थी। 12वीं से 14वीं शताब्दी में संस्कृत के कई मूल शास्त्र शारदा लिपि में लिखे गए हैं। उन्होंने बताया कि युवाओं और सभी लोगों के लिए इस लिपि को सीखना जरूरी है ताकि वह इन अमूल्य ग्रंथों को पढ़ सकें और समझ सकें। साथ ही विभिन्न स्थानों पर रखे गए अभिलेख और लिपियां विद्यार्थी खुद पढ़ सकें। कार्यशाला में प्रशिक्षुओं को शारदा लिपि के साथ अन्य प्राचीन लिपियों के बारे में भी बताया जाएगा।
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कश्मीर की शारदा पीठ से निकली शारदा लिपि : नीलम राजदान
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। सरहदों में बंट चुके कई देशों में कभी एक ही लिपि का इस्तेमाल ग्रंथों को लिखने में होता। पाकिस्तान और अफगानिस्तान से लेकर हिमाचल तक शारदा लिपि में कई ग्रंथ लिखे गए हैं।
यह जानकारी राजधानी के गेयटी थियेटर के सम्मेलन कक्ष में शारदा लिपि पर चल रही कार्यशाला में नीलम राजदान ने दी। नीलम मुंबई विश्वविद्यालय से प्रबंधन अध्ययन में स्नातकोत्तर हैं। कार्यशाला में बुधवार को वर्णमाला सिखाई गई। वक्ताओं ने बताया कि 14वीं शताब्दी तक पाकिस्तान से लेकर हिमाचल और पंजाब तक शारदा लिपि का इस्तेमाल होता था। कार्यशाला में प्रशिक्षुओं को पांडुलिपियों का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। कार्यशाला में ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से लोग लिपि सीख रहे हैं। कार्यशाला भाषा-संस्कृति विभाग और राजीव गांधी राजकीय महाविद्यालय चौड़ा मैदान के सहयोग से आयोजित की जा रही है। कार्यशाला के दूसरे दिन हिमाचल सहित संपूर्ण उतर-पश्चिम भारत की प्राचीन शारदा लिपि के संदर्भ में पहले सत्र में लिपि की उत्पत्ति और इतिहास के बारे में जानकारी दी गई। नीलम राजदान ने बताया कि उन्होंने जम्मू विश्वविद्यालय से शारदा लिपि का कोर्स किया है। शारदा लिपि कश्मीर मंडल में शारदा पीठ (प्रमुख विद्या का स्थान) से निकली है। वहीं वाराणसी के नालंदा में देवनागरी लिपि की उत्पत्ति हुई है। इन दोनों का मूल ब्राह्मी लिपि है।
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प्राचीन समय में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कश्मीर, दिल्ली, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में शारदा लिपि लिखी और समझी जाती थी। 12वीं से 14वीं शताब्दी में संस्कृत के कई मूल शास्त्र शारदा लिपि में लिखे गए हैं। उन्होंने बताया कि युवाओं और सभी लोगों के लिए इस लिपि को सीखना जरूरी है ताकि वह इन अमूल्य ग्रंथों को पढ़ सकें और समझ सकें। साथ ही विभिन्न स्थानों पर रखे गए अभिलेख और लिपियां विद्यार्थी खुद पढ़ सकें। कार्यशाला में प्रशिक्षुओं को शारदा लिपि के साथ अन्य प्राचीन लिपियों के बारे में भी बताया जाएगा।
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