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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Russia-Ukraine war update: No bread to eat, money in pocket, survived on water-biscuit, caught train after walking six km

यूक्रेन संकट: खाने को रोटी न जेब में पैसा, हिमाचल के विद्यार्थियों ने छह किमी पैदल चलकर पकड़ी ट्रेन

Tue, 01 Mar 2022 06:14 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Tue, 01 Mar 2022 06:14 PM IST
सार

 शिमला की छात्रा अनुष्का कुठियाला, अदिति और मंडी जिला के करसोग के छात्र शिवांश सहित कई छात्र-छात्राएं वहां फंसे हुए हैं। व्हाट्सएप के जरिये इन विद्यार्थियों की बीच-बीच में परिजनों से बात होती है। छात्र-छात्राओं के अनुसार वहां न खाने को रोटी है और न ही जेब में पैसा बचा है। 

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Russia-Ukraine war update:  No bread to eat, money in pocket, survived on water-biscuit, caught train after walking six km
छात्रा अनुष्का कुठियाला, अदिति और छात्र शिवांश । - फोटो : संवाद

विस्तार

यूक्रेन में जंग के बीच फंसे हिमाचली छात्र-छात्राओं के परिजनों की चिंता बढ़ गई है। जैसे-जैसे यूक्रेन-रूस के बीच युद्ध तेज हो रहा है, वैसे-वैसे परिजनों का दिल बैठ रहा है।  शिमला की छात्रा अनुष्का कुठियाला, अदिति और मंडी जिला के करसोग के छात्र शिवांश सहित कई छात्र-छात्राएं वहां फंसे हुए हैं। व्हाट्सएप के जरिये इन विद्यार्थियों की बीच-बीच में परिजनों से बात होती है। छात्र-छात्राओं के अनुसार वहां न खाने को रोटी है और न ही जेब में पैसा बचा है। पानी-बिस्कुट से गुजारा हो रहा है। मदद के इंतजार में 24 फरवरी से ये अंडर ग्राउंड मेट्रो स्टेशन में छिपे हुए थे। इंतजार से थक-हारकर इन्होंने खुद ही हिम्मत जुटाकर बाहर निकलने की योजना बनाई। मंगलवार सुबह ये सभी अंडर ग्राउंड मेट्रो स्टेशन से निकले और छह किलोमीटर पैदल चलकर पोलैंड बॉर्डर के समीप लबीब शहर के लिए ट्रेन पकड़ी।

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व्हाट्सएप मैसेज में इन छात्र-छात्राओं ने बताया है कि 13 घंटे बाद लबीब पहुंचेंगे। अनुष्का के पिता राजीव कुठियाला और माता गीता कुठियाला ने बताया कि अभी तो संपर्क हो पा रहा है, मगर बच्चों का वतन लौटने का रास्ता इतना आसान नहीं है। लबीब में सुबह छह बजे ट्रेन पहुंचेगी। उसके बाद बच्चों को यह भी मालूम नहीं कि आगे उन्हें कैसे जहाज मिलेगा। अनुष्का और उसके साथ चल रहे बच्चों के पास पैसे भी नहीं हैं। 24 फरवरी को उन्होंने अंतिम बार एटीएम से पैसे निकाले थे। अभिभावकों का कहना है कि अब तक इन बच्चों को भारतीय दूतावास यूक्रेन की ओर से कोई मदद नहीं मिली है।

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