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कांगड़ा में भाजपा की गुटबाजी से संगठन को चुनौती

Sat, 20 Jul 2019 01:21 PM IST
अरविन्द ठाकुर सुनील चड्ढा, अमर उजाला, धर्मशाला
सुनील चड्ढा, अमर उजाला, धर्मशाला Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Sat, 20 Jul 2019 01:21 PM IST
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Rift in BJP leaders in Kangra Himachal Pradesh and RSS strategy
सांकेतिक तस्वीर

दो बार मुख्यमंत्री देने वाला सूबे का सबसे बड़ा जिला कांगड़ा वर्तमान में राजनीतिक नेतृत्व के संकट से गुजर रहा है। वर्तमान में सियासी हालात ऐसे बन गए हैं कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में कांगड़ा के सियासी दुर्ग से कोई भी नेता अति महत्वाकांक्षाओं के चलते अपने जिला को नेतृत्व देने की स्थिति में नहीं रहा।

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जिला कांगड़ा में कांग्रेस का कोई भी नेता विपक्ष की भूमिका नहीं निभा रहा है। हार के बाद कांग्रेस के दो कद्दावर नेता जीएस बाली और सुधीर शर्मा राजनीतिक परिदृश्य से दूर हो चुके हैं। सुजान सिंह पठानिया बीमारी के चलते लंबे अरसे से राजनीतिक धुरी से दूर हैं।
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कांगड़ा से वीरभद्र सिंह के नेतृत्व को चुनौती देने वाले विजय सिंह मनकोटिया, बीबीएल बुटेल, विप्लव ठाकुर, चंद्रेश कुमारी और चौधरी चंद्र कुमार सियासी एकांतवास में रह रहे हैं। उधर, कांगड़ा जिला में संगठन के तौर पर भाजपा मजबूत तो है लेकिन अंतर्कलह की वजह से नेतृत्व संकट से पार नहीं पा रही।

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कांगड़ा से जयराम कैबिनेट में चार मंत्री पद मिले थे लेकिन सभी अपने विधानसभा क्षेत्र के मोहजाल के चलते जिला के नेतृत्व की बागडोर संभालने से चूक गए। बिक्रम ठाकुर और सरवीण चौधरी अपने विस क्षेत्रों से बाहर नहीं निकल पाए। कपूर दिल्ली पहुंच गए।

सभी बड़े नेता राजनीतिक रूप से अकेले पड़ चुके हैं। इस पूरे सियासी चक्रव्यूह में कांगड़ा के हाथ से नेतृत्व की बागडोर खिसककर दूसरे जिलों में जाने के चलते सूबे का सबसे बड़ा जिला राजनीतिक शून्यता की ओर बढ़ता जा रहा है। हालांकि, इन्वेस्टर मीट के बहाने जयराम कांगड़ा को साधने की कोशिश कर रहे हैं। 

शांता, सत महाजन, संत राम ने संभाली थी बागडोर
दो बार मुख्यमंत्री रहे शांता कुमार ने जिला कांगड़ा के बाहर अपने उत्तराधिकारी के तौर पर धूमल, नड्डा और जयराम सरीखे कई नेताओं को तैयार किया लेकिन अपने ही जिले में वह खुद के बाद नेतृत्व पैदा करने में चूक गए। उधर, कांग्रेस की ओर से सत महाजन और संतराम ने जरूर कांगड़ा की बागडोर अपने हाथ में ली थी लेकिन बाद में कोई बड़ा नेता खुद को साबित नहीं कर पाया।  

कांगड़ा के लिए स्थिति अच्छी नहीं : शर्मा
परमार, रामलाल, वीरभद्र, शांता और धूमल सरकार में अहम पदों पर रहे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एवं राजनीतिक विश्लेषक केसी शर्मा कहते हैं कि सियासी शून्यता की स्थिति कांगड़ा जिले के लिए वांछनीय नहीं है। इस शून्य को भरने के लिए संबंधित दलों को अपने भीतर आंतरिक विचार मंथन करने के उपरांत किसी नए युवा नेतृत्व का निर्माण करना आवश्यक है

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