20 अप्रैल, हम हिंदुस्तानियों के लिए बड़ा खास है ये दिन
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20 अप्रैल का यह दिन सभी हिंदुस्तानियों के लिए बड़ा यादगार दिन है। इसी दिन उतर भारत में आजादी की पहली लड़ाई का आगाज हुआ था। पंजाब और पहाड़ी रियासतों में 1857 में शुरू हुई आजादी की पहली लड़ाई का बीज कसौली में बोया गया था। 20 अप्रैल यानी आज का दिन हिमाचल के इतिहास के सुनहरे पन्नों से जुड़ा है।
ठीक 157 साल पहले आज का ही दिन था, जब ब्रिटिश भारतीय जवानों ने कसौली में थाना फूंक डाला। अंग्रेजों के शक्तिशाली गढ़ में भारतीय सैनिकों की इस सेंध से ब्रिटिश हुकूमत बौखला गई। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इस पहली लड़ाई को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, 1857 की क्रांति या 1857 का गदर जैसे कई नाम दिए गए।
हिमाचल की पहाड़ी रियासतों में भी यह क्रांति समग्र रूप से चली। पंजाब, अंबाला और जालंधर छावनियों के समीपवर्ती क्षेत्रों कांगड़ा, जतोग, नालागढ़, सुबाथू, डगशाई और कसौली छावनियों में भी इसका असर पड़ा था। मगर अफसोस सामाजिक संस्थाओं के अलावा प्रदेश सरकार के ध्यान में यह बात नहीं है। सोमवार को एक सामाजिक संस्था कसौली के हैरिटेज मार्केट में भारतीय वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित करेगी।
यहां से शुरू हुआ रोचक इतिहास
20 अप्रैल 1857 को अंबाला राइफल डिपो के छह भारतीय सैनिकों ने कसौली थाने को फूंक दिया। अंग्रेजों ने मेरठ, दिल्ली व अंबाला में विद्रोह की खबर मिलते ही कसौली छावनी के सैनिकों को अंबाला कूच करने के आदेश दिए। भारतीय सैनिकों ने आदेश ठुकराए और बंदूकें उठा लीं।
कसौली छावनी में नसीरी बटालियन गोरखा रेजिमेंट थी। कसौली में आग की घटना के अलावा डगशाई, सुबाथू, कालका और जतोग छाविनयों में तैनात भारतीय सैनिकों का विद्रोह आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। लेकिन यह वीर कहां गए, इनका रिकॉर्ड नहीं है।
बैरागी को मिली थी फांसी
गदर को कामयाब बनाने के लिए हिमाचल में गुप्तचर संगठन बनाया गया। सुबाथू के नेता राम प्रसाद बैरागी इसके मुखिया थे। वह सुबाथू मंदिर के पुजारी थे। वह संगठन पत्रों के माध्यम से पूरे देश में संपर्क बनाकर जनक्रांति चलाकर अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ना चाहते थे।
12 जून 1857 को इस गुप्त संगठन के कुछ पत्र अंबाला के कमिश्नर जीसी बार्नस के हाथ लगे। दो पत्र सुबाथू के पंडित राम प्रसाद वैरागी के भी थे, उनको पकड़कर अंबाला जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया। सुबाथू का राम प्रसाद बैरागी चौक इसी घटना के बाद बना।
ये सपूत भी हुए थे शहीद
अंग्रेजी सेना के सूबेदार भीम सिंह बहादुर ने बागी होकर 13 मई 1857 को ब्रिटिश कसौली ट्रेजरी को लूटकर अपने कब्जे में ले लिया था। इस घटना को अतिरिक्त कमिश्नर पी मैक्सवैल ने अपनी डायरी में लिखा है कि ये हैरत की बात है कि कैसे मुट्टीभर क्रांतिकारियों ने अपने से चार गुणा अधिक अंग्रेजी सेना को उनके ही गढ़ में धूल चटा दी।
सिर्फ 45 भारतीय सैनिकों ने 200 अंग्रेजी सैनिकों को हरा दिया। ट्रेजरी लूटने के बाद क्रांतिकारी जतोग कूच कर गए, जिसके बाद कसौली में विद्रोह की बागडोर स्थानीय पुलिस ने अपने हाथों में ले ली।
दरोगा बुध सिंह ने अंग्रेजों को आतंकित किया। पकडे़ जाने पर बुध सिंह ने स्वयं को गोली मारकर शहीद कर दिया। सूबेदार भीम सिंह बहादुर को मृत्युदंड मिला लेकिन वे रायपुर भाग गए, बाद में विद्रोह की विफलता पर उन्होंने खुद को शहीद कर लिया।
इन किताबों में मिलता है जिक्र
हाल ही में प्रकाशित नेताजी सुभाष चंद्र बोस किताब में इसका जिक्र मिलता है। स्वाधीन चंद्र गौड़ द्वारा प्रकाशित और प्रेम लाल गौतम शिक्षार्थी एवं डॉ. शंकर वासिष्ठ द्वारा संपादित इस किताब में भारत की पहली क्रांति और हिमाचल से गहरा संबंध देखने को मिलता है।
इसके अलावा अंकुर बंसल द्वारा लिखित कसौली पाइनस, वाइनस एंड ओल्ड टाइम एवं पंजाब गैजिटियर 1923, हैंडबुक और कसौली कंटोनमेंट 1922 और नालागढ़ स्टेट गैजिटेयर में भी इसका जिक्र है।
आज देंगे श्रद्धांजलि
स्वतंत्रता सेनानियों के अमर बलिदान को याद करने के लिए कसौली में आज श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। सरगम कला मंच के अध्यक्ष जिया लाल ठाकुर ने बताया कि 20 अप्रैल 1857 को क्रांति की लहर कसौली से पूरे हिमाचल में शुरू हुई थी। स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धासुमन अर्पित करके याद किया जाएगा।