सिंधु की तरह चमकना चाहती है पहाड़ की बेटियां, सरकार है कि मदद नहीं करती
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पहाड़ी राज्य हिमाचल में बैडमिंटन जैसे खेल के लिए खिलाड़ियों में बेहतर स्टेमिना है, प्रतिभा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने की क्षमता भी। प्रदेश में इस खेल के लिए सुविधाओं के अभाव के बावजूद कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा का लोहा मनवाया है।
लेकिन खुले मैदान में अभ्यास करने वाले खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों के मुताबिक बने इंडोर स्टेडियम में पर्याप्त अभ्यास न होने और नियमित प्रशिक्षण न होने के कारण पिछड़ जाते हैं। प्रदेश सरकार और विभाग से खेल को बढ़ावा देने के लिए वार्षिक 75 हजार का बजट मिलता है, मगर ब्लॉक से लेकर राज्य स्तर तक की प्रतियोगिताएं करवाने में ही लाखों का खर्च होता है।
ऐसे में संघ के पास खेल अभ्यास और प्रशिक्षण की सुविधाएं देने के लिए बजट ही नहीं बचता। प्रदेश की बैडमिंटन खेल की प्रतिभाओं को निखारने के लिए प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक और इंडोर स्टेडिम निर्माण करवाने होंगे, जहां रेगुलर कोच और अभ्यास की सुविधा उपलब्ध हो।
वर्तमान में प्रदेश में धर्मशाला, ऊना, और बिलासपुर में इंडोर स्टेडियम हैं। जिला शिमला में भी साई का इंडोर स्टेडियम है, मगर इसका इस्तेमाल अभ्यास के लिए नहीं होता। मंडी, सोलन, राजधानी शिमला में इंडोर खेल की सुविधा है जहां खिलाड़ी अभ्यास करते हैं, मगर वह उस स्तर की नहीं।
इन्होंने चमकाया प्रदेश का नाम
प्रदेश बैडमिंटन संघ के महासचिव राजेंद्र शर्मा का कहना है कि प्रदेश ने एक से बढ़कर खिलाड़ी दिए हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन किया है। इनमें आरजू ठाकुर, योगेश चौहान, नितेश, कर्ण नेगी, सहजल चौहान, अजय कैथ आदि शामिल हैं।
सही सुविधाएं और उचित प्रशिक्षण मिले तो ये और बेहतर कर सकते हैं। हालांकि संघ अपने स्तर पर और सरकार से मिली राशि से ग्रामीण स्तर से अच्छे प्रतिभावान खिलाड़ियों को आगे लाने के लिए प्रतियोगिताएं लगातार करवाता आ रहा है।
मगर सरकार से पर्याप्त बजट मिले और प्रदेश में आधारभूत ढांचा विकसित हो तो ओलंपिक में हिमाचल के खिलाड़ी भी मेडल लाने में सक्षम होंगे। हाल ही में सरकार ने धर्मशाला, ऊना और शिमला में बैडमिंटन कोच दिए हैं, जिससे खिलाड़ियों का नियमित अभ्यास और प्रशिक्षण हो सकेगा।
सुविधाओं के साथ वित्तीय मदद भी जरूरी
पंजाब की ओर से 2001 में नेशनल गेम्स में कांस्य पदक विजेता, नार्थ जोन में नंबर वन रहे और बीएएसएनल में गोल्ड मेडल विजेता सोलन के योगेश चौहान मानते हैं कि बैडमिंटन महंगा खेल है, सरकार आधारभूत सुविधाओं के साथ प्रतिभाओं को तलाशने, उन्हें नियमित खेल प्रशिक्षण के साथ वित्तीय मदद की व्यवस्था करे तो प्रदेश के खिलाड़ी अपने को हर मोर्चे पर साबित करने में सक्षम हैं।
लगातार हों खेल स्पर्धाएं और अभ्यास
राष्ट्रीय स्तर की खेलों में दो बार 2008, 2010 में मेडल विजेता रही, ओपन बैडमिंटन में अंडर-19 में टॉप रैंकिंग में सातवें स्थान पर रह चुकी सिरमौर के ददाहू की बेटी आरजू ने साबित किया है कि पहाड़ी की बेटियां किसी से कम नहीं। आरजू और उनके पिता बैडमिंटन अकादमी चलाते हैं। उनका मानना है बैडमिंटन खेल प्रचलित हुआ है। प्रतिभाओं को निखारने को जिला स्तर पर बैडमिंटन इंडोर स्टेडियम होने के साथ ही नियमित अभ्यास और राज्य-राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाएं प्रदेश में नियमित तौर पर होने से खिलाड़ी आगे बढ़ेंगे।
बिना प्रैक्टिस ऊना में कैसे उभरेंगे बैडमिंटन खिलाड़ी
ऊना। अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी पीवी सिंधु की तरह भारत का नाम चमकाने का सपना संजोए ऊना के खिलाडिय़ों को बिना कोच प्रैक्टिस करनी पड़ रही है। पिछले कई दशकों से ऊना के खिलाड़ियों को कोच की सुविधा ही नहीं मिल पाई है। जिला से नेशनल खेल चुके दीपक जिला सहित प्रदेश का नाम रोशन कर चुके हैं। वहीं आभा बंसल, करण, अभिषेक राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा लेकर अपनी प्रतिभा को प्रर्दशित कर चुके हैं। उम्दा प्रर्दशन करने वाले खिलाड़ियों को इंडोर स्टेडियम में निशुल्क प्रैक्टिस तक की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।