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Shimla News: एचपीयू में सुपरवाइजरों की संख्या पर तय होंगी पीएचडी की सीटें
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खास खबर
हिमाचल विश्वविद्यालय में पीएचडी के नए संशोधित नियम लागू, शोधार्थियों के लिए प्रवेश चुनौतीपूर्ण होगा
जून 2025 के पुराने पीएचडी नियम अब मान्य नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला ने पीएचडी के नए संशोधित नियमों को लागू कर दिया है। नए नियमों के तहत अब सीटें विभाग में उपलब्ध सुपरवाइजरों की संख्या के अनुसार तय होंगी।
इसमें जिन विभागों में सुपरवाइजर कम हैं वहां सीटें भी कम हो जाएंगी। शैक्षणिक परिषद की कुछ दिन पहले हुई बैठक में यह प्रस्ताव पास हुआ है जिसे डीन समिति ने मंजूरी दे दी है। विश्वविद्यालय ने इसकी अधिसूचना जारी कर दी है। जून 2025 में जारी पुराने पीएचडी नियम अब मान्य नहीं रहेंगे। नए नियम लागू होने के बाद पीएचडी प्रवेश पहले की तरह नहीं रहेगा। इससे शोधार्थियों के लिए प्रवेश अधिक चुनौतीपूर्ण होगा और प्रतिस्पर्धा पहले की तुलना में बढ़ जाएगी।
छात्रों को अब अपने विषय और सुपरवाइजर के चुनाव में अधिक सावधानी बरतनी होगी क्योंकि उपलब्धता सीमित रहेगी। पाठ्यक्रम को भी पहले से अधिक सख्त बनाया गया है। उपस्थिति, मूल्यांकन और पासिंग की शर्तें बदलने के बाद शुरुआत से ही छात्रों पर अध्ययन और अनुसंधान के प्रति अधिक अनुशासित रहने का दबाव रहेगा। शोध प्रक्रिया में सबसे बड़ा बदलाव आरडीसी को लेकर हुआ है।
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अब आरडीसी (रिसर्च डवेलपमेंट कमेटी) की बैठकें समय पर होंगी और हर शोधार्थी को तय समय में प्रगति रिपोर्ट देना अनिवार्य रहेगा। विषय अनुमोदन, संशोधन और आगे की कार्रवाई भी देरी के बिना पूरी करनी होगी। लंबे समय से कई शोध फाइलें विभागों में अटकी रहती थीं जिन्हें अब नई व्यवस्था कम करने में मदद करेगी। विभागाध्यक्षों को 2025-26 सत्र से पहले तैयारी पूरी करने के निर्देश जारी कर दिए हैं। इन्हें सुपरवाइजरों की उपलब्धता, सीटों की नई गणना, पाठयक्रमों की व्यवस्था और आरडीसी का वार्षिक कैलेंडर नए नियमों के अनुसार तैयार करना होगा। कई विभागों में स्टाफ की कमी के कारण सीटों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। पीएचडी करने की इच्छा रखने वाले छात्रों के लिए यह बदलाव एक नई चुनौती है और एक नई उम्मीद भी। विश्वविद्यालय का दावा है कि नई व्यवस्था शोध की गुणवत्ता को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करेगी जबकि छात्र समुदाय इसे एक सख्त लेकिन जरूरी सुधार के रूप में देख रहा है।
शोधों का बनेगा डिजिटल रिकार्ड
प्री-थीसिस प्रेजेंटेशन से लेकर बाहरी मूल्यांकन और अंतिम वाइवा तक हर चरण को पारदर्शी तथा डिजिटल प्रणाली में शामिल किया है। इससे दस्तावेजों के गुम होने फाइलों के रुकने या किसी चरण पर अनावश्यक विलंब होने की संभावना कम होगी। सभी वाइवा और शोध पत्रों का डिजिटल रिकार्ड बनेगा। विश्वविद्यालय का कहना है कि इस बदलाव से शोधार्थियों को हर कदम पर स्पष्ट दिशा मिलेगी।
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हिमाचल विश्वविद्यालय में पीएचडी के नए संशोधित नियम लागू, शोधार्थियों के लिए प्रवेश चुनौतीपूर्ण होगा
जून 2025 के पुराने पीएचडी नियम अब मान्य नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला ने पीएचडी के नए संशोधित नियमों को लागू कर दिया है। नए नियमों के तहत अब सीटें विभाग में उपलब्ध सुपरवाइजरों की संख्या के अनुसार तय होंगी।
इसमें जिन विभागों में सुपरवाइजर कम हैं वहां सीटें भी कम हो जाएंगी। शैक्षणिक परिषद की कुछ दिन पहले हुई बैठक में यह प्रस्ताव पास हुआ है जिसे डीन समिति ने मंजूरी दे दी है। विश्वविद्यालय ने इसकी अधिसूचना जारी कर दी है। जून 2025 में जारी पुराने पीएचडी नियम अब मान्य नहीं रहेंगे। नए नियम लागू होने के बाद पीएचडी प्रवेश पहले की तरह नहीं रहेगा। इससे शोधार्थियों के लिए प्रवेश अधिक चुनौतीपूर्ण होगा और प्रतिस्पर्धा पहले की तुलना में बढ़ जाएगी।
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छात्रों को अब अपने विषय और सुपरवाइजर के चुनाव में अधिक सावधानी बरतनी होगी क्योंकि उपलब्धता सीमित रहेगी। पाठ्यक्रम को भी पहले से अधिक सख्त बनाया गया है। उपस्थिति, मूल्यांकन और पासिंग की शर्तें बदलने के बाद शुरुआत से ही छात्रों पर अध्ययन और अनुसंधान के प्रति अधिक अनुशासित रहने का दबाव रहेगा। शोध प्रक्रिया में सबसे बड़ा बदलाव आरडीसी को लेकर हुआ है।
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अब आरडीसी (रिसर्च डवेलपमेंट कमेटी) की बैठकें समय पर होंगी और हर शोधार्थी को तय समय में प्रगति रिपोर्ट देना अनिवार्य रहेगा। विषय अनुमोदन, संशोधन और आगे की कार्रवाई भी देरी के बिना पूरी करनी होगी। लंबे समय से कई शोध फाइलें विभागों में अटकी रहती थीं जिन्हें अब नई व्यवस्था कम करने में मदद करेगी। विभागाध्यक्षों को 2025-26 सत्र से पहले तैयारी पूरी करने के निर्देश जारी कर दिए हैं। इन्हें सुपरवाइजरों की उपलब्धता, सीटों की नई गणना, पाठयक्रमों की व्यवस्था और आरडीसी का वार्षिक कैलेंडर नए नियमों के अनुसार तैयार करना होगा। कई विभागों में स्टाफ की कमी के कारण सीटों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। पीएचडी करने की इच्छा रखने वाले छात्रों के लिए यह बदलाव एक नई चुनौती है और एक नई उम्मीद भी। विश्वविद्यालय का दावा है कि नई व्यवस्था शोध की गुणवत्ता को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करेगी जबकि छात्र समुदाय इसे एक सख्त लेकिन जरूरी सुधार के रूप में देख रहा है।
शोधों का बनेगा डिजिटल रिकार्ड
प्री-थीसिस प्रेजेंटेशन से लेकर बाहरी मूल्यांकन और अंतिम वाइवा तक हर चरण को पारदर्शी तथा डिजिटल प्रणाली में शामिल किया है। इससे दस्तावेजों के गुम होने फाइलों के रुकने या किसी चरण पर अनावश्यक विलंब होने की संभावना कम होगी। सभी वाइवा और शोध पत्रों का डिजिटल रिकार्ड बनेगा। विश्वविद्यालय का कहना है कि इस बदलाव से शोधार्थियों को हर कदम पर स्पष्ट दिशा मिलेगी।