{"_id":"6a96dcc309b5c625a307af4a","slug":"obtained-a-government-job-using-a-fake-class-10-certificate-shimla-news-c-19-sml1002-779618-2026-09-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Shimla News: दसवीं का फर्जी प्रमाणपत्र बना \nहासिल कर ली सरकारी नौकरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Shimla News: दसवीं का फर्जी प्रमाणपत्र बना हासिल कर ली सरकारी नौकरी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कोर्ट से अग्रिम जमानत याचिका खारिज, यूपी शिक्षा बोर्ड के बनाए थे फर्जी प्रमाणपत्र
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यजुवेंद्र सिंह की अदालत का फैसला
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। भारतीय डाक विभाग में दसवीं के जाली प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने के मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यजुवेंद्र सिंह की अदालत ने मुख्य आरोपी सोनू की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी ने न केवल धोखाधड़ी कर सरकारी पद हासिल किया, बल्कि उन योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों पर भी डाका डाला जो अपनी वास्तविक योग्यताओं के आधार पर इस पद के हकदार थे। विकास नेगी की शिकायत के आधार पर पुलिस ने हरियाणा निवासी आरोपी सोनू और सह-आरोपी विक्रम के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 465, 468 और 471 के तहत मामला दर्ज किया था।
आरोप है कि दोनों ने वर्ष 2020 में ऑनलाइन आवेदन के दौरान उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड प्रयागराज के फर्जी दसवीं के प्रमाणपत्र लगाए थे। दस्तावेजों के प्रारंभिक सत्यापन के बाद 3 अप्रैल 2021 को दोनों की नियुक्ति भी हो गई थी। हालांकि बाद में गहन जांच के दौरान उनके प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए जिसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था। सुनवाई के दौरान लोक अभियोजक ने अदालत को बताया कि दोनों आरोपी अब तक जांच में शामिल नहीं हुए हैं। इस बड़े फर्जीवाड़े की जड़ तक पहुंचने के लिए आरोपी सोनू की कस्टोडियल इंटेरोगेशन (हिरासत में पूछताछ) बेहद जरूरी है।
विज्ञापन
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह के अपराध केवल धोखाधड़ी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह समाज के एक बड़े हिस्से और सरकारी विभागों की चयन प्रक्रिया में जनता के भरोसे को भी ठेस पहुंचाते हैं। ऐसे मामलों में व्यापक सामाजिक हित जुड़े होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों, जैसे प्रभा बनाम हरियाणा राज्य और पी. चिदंबरम मामले का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि अपराध की गंभीरता और षड्यंत्र के तौर-तरीकों को उजागर करने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ करना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि अग्रिम जमानत देकर पूछताछ करने से सच्चाई सामने नहीं आ सकती। इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद अदालत ने आरोपी सोनू को अग्रिम जमानत का लाभ देने से इनकार करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। गौरतलब है कि डाक विभाग में दसवीं के अंकों के आधार पर ग्रामीण डाक सेवक की भर्ती की जाती है।
विज्ञापन
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यजुवेंद्र सिंह की अदालत का फैसला
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। भारतीय डाक विभाग में दसवीं के जाली प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने के मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यजुवेंद्र सिंह की अदालत ने मुख्य आरोपी सोनू की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी ने न केवल धोखाधड़ी कर सरकारी पद हासिल किया, बल्कि उन योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों पर भी डाका डाला जो अपनी वास्तविक योग्यताओं के आधार पर इस पद के हकदार थे। विकास नेगी की शिकायत के आधार पर पुलिस ने हरियाणा निवासी आरोपी सोनू और सह-आरोपी विक्रम के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 465, 468 और 471 के तहत मामला दर्ज किया था।
विज्ञापन
आरोप है कि दोनों ने वर्ष 2020 में ऑनलाइन आवेदन के दौरान उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड प्रयागराज के फर्जी दसवीं के प्रमाणपत्र लगाए थे। दस्तावेजों के प्रारंभिक सत्यापन के बाद 3 अप्रैल 2021 को दोनों की नियुक्ति भी हो गई थी। हालांकि बाद में गहन जांच के दौरान उनके प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए जिसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था। सुनवाई के दौरान लोक अभियोजक ने अदालत को बताया कि दोनों आरोपी अब तक जांच में शामिल नहीं हुए हैं। इस बड़े फर्जीवाड़े की जड़ तक पहुंचने के लिए आरोपी सोनू की कस्टोडियल इंटेरोगेशन (हिरासत में पूछताछ) बेहद जरूरी है।
विज्ञापन
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह के अपराध केवल धोखाधड़ी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह समाज के एक बड़े हिस्से और सरकारी विभागों की चयन प्रक्रिया में जनता के भरोसे को भी ठेस पहुंचाते हैं। ऐसे मामलों में व्यापक सामाजिक हित जुड़े होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों, जैसे प्रभा बनाम हरियाणा राज्य और पी. चिदंबरम मामले का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि अपराध की गंभीरता और षड्यंत्र के तौर-तरीकों को उजागर करने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ करना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि अग्रिम जमानत देकर पूछताछ करने से सच्चाई सामने नहीं आ सकती। इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद अदालत ने आरोपी सोनू को अग्रिम जमानत का लाभ देने से इनकार करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। गौरतलब है कि डाक विभाग में दसवीं के अंकों के आधार पर ग्रामीण डाक सेवक की भर्ती की जाती है।