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Shimla News: आईजीएमसी में आभा से नहीं पर्चियां, मरीज परेशान

Mon, 28 Jul 2025 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Mon, 28 Jul 2025 11:59 PM IST
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No prescriptions from Abha in IGMC, patients upset
ओटीपी न आने से हुई दिक्कत, घंटों लाइनों में खड़े रहे मरीज, प्रबंधन से सुधार की मांग
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पर्चियां बनाने के लिए ओटीपी दिखाना है जरूरी
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। राजधानी के इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) में सोमवार को बड़ी संख्या में मरीज पर्ची बनवाने के लिए सुबह 9 बजे से ही लाइन में लग गए थे। आभा नंबर से रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू हुई तो कई लोगों के मोबाइल पर ओटीपी नहीं आया।
ओटीपी न आने के कारण पर्ची नहीं बन सकी और मरीजों को घंटों लाइन में खड़े रहना पड़ा। हैरत इस बात की है कि लोग इस समस्या से कई दिनों से परेशान हैं लेकिन अस्पताल प्रबंधन इसमें सुधार नहीं कर रहा है। कुछ को बार-बार कोशिश करने पर भी ओटीपी नहीं मिला। इसके अलावा कई बुजुर्गों और तकनीक से अनजान मरीजों को यह समझ नहीं आया कि करना क्या है। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत आभा कार्ड आधारित ओपीडी पर्ची प्रणाली पिछले साल 7 अगस्त से शुरू की थी। इसका उद्देश्य ओपीडी में मरीजों का डिजिटल रजिस्ट्रेशन करना और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना था। इसके लिए ओपीडी भवन की दूसरी मंजिल पर आभा काउंटर बनाए गए हैं जहां क्यूआर कोड स्कैन करके आभा आईडी से पर्ची बनाई जाती है।
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पर्ची प्रक्रिया को आसान बताया था लेकिन हाल के दिनों में मरीजों को इससे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आभा कार्ड से पर्ची बनाने की प्रक्रिया में सबसे जरूरी हिस्सा मोबाइल फोन बन गया है। आभा नंबर दर्ज करने के बाद संबंधित मोबाइल नंबर पर ओटीपी भेजा जाता है। मरीज को वही ओटीपी दर्ज करना होता है, तभी उसकी जानकारी सिस्टम में दिखती है और पर्ची बनती है।
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कुछ मरीज ऐसे भी आते हैं जिनके पास या तो मोबाइल नहीं हैं या फिर एंड्रायड मोबाइल नहीं हैं। इनके लिए एप डाउनलोड करना मुश्किल होता है जिस कारण पर्चियां नहीं बन पातीं। ठियोग से आए 65 वर्षीय रमेश चौहान ने बताया कि उनके पास खुद का मोबाइल नहीं है, बेटे का नंबर आभा कार्ड से जुड़ा है, लेकिन वह साथ नहीं आया। ओटीपी न मिलने के कारण वह घंटों से लाइन में खड़े हैं। मंजू देवी ने कहा कि तीन बार कोशिश करने के बाद भी ओटीपी नहीं आया और उन्हें दोबारा लाइन में लगने को कहा गया है।


मोबाइल की अनिवार्यता से दिक्कत
मोबाइल की अनिवार्यता बुजुर्गों, ग्रामीणों और तकनीक से दूर लोगों के लिए बड़ी बाधा बन गई है। सरकारी अस्पताल में जहां पहले पर्ची बनवाना मिनटों का काम होता था, अब वही प्रक्रिया तकनीकी वजह से घंटों की बनती जा रही है। प्रशासन ने व्यवस्था को डिजिटल बनाने का प्रयास किया है, लेकिन यह तभी सफल हो सकता है जब तकनीकी खामियां दूर हों और आम लोगों को इसकी पूरी जानकारी मिले।





विकल्प की व्यवस्था करे सरकार
मरीजों और तीमारदारों ने मांग की है कि अस्पताल में पर्ची बनाने का एक विकल्प भी मौजूद होना चाहिए ताकि ओटीपी न आने या मोबाइल न होने की स्थिति में मरीज उपचार से वंचित न हों। डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था समय की मांग है, लेकिन इसे लागू करते समय जमीनी हकीकत को समझना और लोगों की सुविधाओं का ख्याल रखना भी उतना ही जरूरी है।
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