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Shimla Development Plan: शिमला डेवलपमेंट प्लान में एनजीटी के आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती

Wed, 31 Aug 2022 10:57 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Wed, 31 Aug 2022 10:57 PM IST
सार

न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब तलब किया है। याचिका में योगेंद्र मोहन सेन गुप्ता सहित नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, नगर निगम शिमला, वन विभाग और केंद्रीय पर्यावरण विभाग को प्रतिवादी बनाया है। 

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NGT orders in Shimla Development Plan challenged in High Court
हिमाचल हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

शिमला सिटी डेवलपमेंट प्लान को स्थगित करने वाले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेशों को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई है। सरकार ने कहा कि डेवलपमेंट प्लान को स्थगित करना एनजीटी के क्षेत्राधिकार से बाहर है। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब तलब किया है। याचिका में योगेंद्र मोहन सेन गुप्ता सहित नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, नगर निगम शिमला, वन विभाग और केंद्रीय पर्यावरण विभाग को प्रतिवादी बनाया है। 

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सरकार की ओर से दायर याचिका में दलील दी गई है कि शिमला शहर और प्लानिंग एरिया में भवन निर्माण के नियमों में राहत देने के लिए सिटी डेवलपमेंट प्लान तैयार किया गया है। वैधानिक कर्तव्य का निर्वहन करते हुए सरकार ने विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर यह प्लान 8 फरवरी, 2022 को बनाया है। 11 फरवरी, 2022 को आम जनता से आपत्तियां और सुझाव भी मांगे गए। निर्धारित 30 दिन के भीतर 97 आपत्तियां और सुझाव मिले। सभी पर टीसीपी विभाग के निदेशक ने सुनवाई की। 16 अप्रैल, 2022 को सरकार ने वर्ष 2,041 तक कुल 22,450 हेक्टेयर भूमि के लिए इस प्लान को अंतिम रूप दिया। 12 मई, 2022 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सरकार के प्लान को स्थगित कर दिया। आरोप लगाया गया है कि एनजीटी की ओर से स्थगन आदेश बिना सोचे-समझे और अनुचित तरीके से पारित किए गए हैं।   
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क्या है शिमला डेवलपमेंट प्लान
एनजीटी ने साल 2017 में शिमला शहर के कोर और ग्रीन एरिया में भवन निर्माण पर रोक लगा दी थी। शहर और प्लानिंग एरिया में सिर्फ ढाई मंजिल भवन के निर्माण की छूट थी। सरकार ने इन पाबंदियों से राहत देने के लिए टीसीपी विभाग से नया डेवलपमेंट प्लान तैयार करवाया था। इसमें शहर के कोर और ग्रीन एरिया में पाबंदी हटाने का प्रावधान था। प्लानिंग एरिया में ढाई मंजिला भवन निर्माण की शर्त भी हटाने का फैसला लिया था। इस प्रस्ताव को कैबिनेट ने भी मंजूरी दे दी थी। विधि विभाग इसकी अधिसूचना जारी करने वाला था कि इससे पहले ही एनजीटी ने प्लान पर रोक लगा दी। साथ ही साल 2017 में जारी आदेशों को सख्ती से लागू करने के लिए कहा है। यह भी टिप्पणी की है कि प्रदेश सरकार ने ट्रिब्यूनल के आदेशों को दरकिनार करने की कोशिश की है।

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वरिष्ठ कर्मचारी को उसके कनिष्ठ से कम वेतन नहीं दिया जा सकता: हाईकोर्ट 

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वेतन विसंगति के मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने निर्णय सुनाया है कि वरिष्ठ कर्मचारी को किसी भी सूरत में उसके कनिष्ठ से कम वेतन नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही दोनों को  वेतन वृद्घि का लाभ दिया गया हों, लेकिन इस विसंगति को अनिश्चित काल के लिए नहीं रखा जा सकता। नियमानुसार वरिष्ठ कर्मचारी को कनिष्ठ कर्मचारी के बराबर वेतनमान दिया जाना चाहिए। अदालत ने जल शक्ति विभाग में कार्यरत कनिष्ठ अभियंता को वर्ष 2007 से वेतन वृद्घि का लाभ दिए जाने के आदेश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता बिपन चंद को यह लाभ 30 अक्टूबर 2022 से पहले दिया जाए। अदालत के आदेशों की अनुपालना न किए जाने पर वेतनमान की बकाया राशि पांच फीसदी ब्याज सहित अदा करनी होगी।

अदालत ने ब्याज की राशि दोषी अधिकारी से वसूलने के आदेश दिए हैं।  याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाई थी कि विभाग को वर्ष 2006 से वेतन वृद्घि दिए जाने के आदेश दिए जाएं। याचिकाकर्ता वर्ष 1978 में  कनिष्ठ अभियंता के पद पर नियुक्त हुआ था और वर्ष 2015 में वह बतौर अधीक्षण अभियंता के पद से सेवानिवृत हुआ था। दलील दी गई कि प्रतिवादी अरुण पराशर शुरू से ही याचिकाकर्ता से कनिष्ठ रहा। विभाग ने वर्ष 1996 से प्रतिवादी को याचिकाकर्ता से अधिक वेतनमान दिया। इस विसंगति को लेकर याचिकाकर्ता ने विभाग के पास प्रतिवेदन किया, जिसे विभाग ने खारिज कर दिया था। अदालत ने मामले से जुड़े तमाम रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए यह निर्णय सुनाया।   

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