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प्राकृतिक कीटनाशकों के विकास पर मंथन, राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन
विपिन काला, अमर उजाला, नौणी (सोलन)
Updated Mon, 05 Nov 2018 10:15 AM IST
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नौणी विवि में किसानों की आय बढ़ाने को संयंत्र स्वास्थ्य प्रबंधन में वैकल्पिक विषय पर आधारित राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर के वैज्ञानिकों ने रोग प्रबंधन में कई वैकल्पिक सुझाव दिए। इसके तहत भारत में कई ऐसे पेड़-पौधे हैं, जो पर्यावरणीय के लिए अनुकूल जैविक कीटनाशक बनाने में बेहद सहायक हो सकते हैं। जो हानिकारक रासायनिक कीटनाशकों के व्यवहार्य और आर्थिक विकल्प के रूप में कार्य कर सकते हैं।
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नौणी विवि के प्लांट पैथोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और हेड डॉ एचआर गौतम ने वनस्पति कीटनाशकों की अप्रयुक्त क्षमता का उपयोग करने की आवश्यकता पर जोर दिया। कहा कि भारत में दो करोड़ नीम के पेड़ हैं। इनसे 80000 टन तेल निकाला जा सकता है। कीटों और बीमारियों के हमले में प्रभावी ढंग से उपयोग में लाया जा सकता है। 1000 से अधिक पौधों की प्रजातियां कीटनाशक गुणों का प्रदर्शन करती हैं।
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384 में एंटीफीडेंट गुणों, 297 प्रतिरोधी गुण, 27 में आकर्षक गुण और 31 में विकास अवरोध गुण पाए जाते हैं। 200 से अधिक पौधों की प्रजातियां ऐसी हैं, जिनमें विभिन्न फसलों के महत्वपूर्ण रोगजनकों के खिलाफ एंटी-माइक्रोबियल गुण हैं। किसान-वैज्ञानिक बातचीत पर एक सत्र भी हुआ। इसमें शिमला, सोलन और मंडी के 100 से अधिक किसानों ने भाग लिया। हिमाचल में प्राकृतिक खेती प्रोजेक्ट के कार्यकारी निदेशक डॉ राजेश्वर सिंह चंदेल इस सत्र के अध्यक्ष रहे।
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इस सत्र में किसानों ने सेब में बीमारी की समस्याओं, पॉलीहाउसों में कैप्सिकम और अन्य फसलों में बीमारियों से संबंधित विभिन्न मुद्दों को उठाया। इस सत्र की सिफारिश यह रही कि मिश्रित फसल के साथ संसाधनों का तर्कसंगत उपयोग पौधे के स्वास्थ्य को प्रबंधित करने और किसानों की आय बढ़ाने का एक उपकरण हो सकता है। समापन सत्र में कुलपति डॉ एचसी शर्मा ने उत्कृष्टता लाने के लिए गुणवत्ता अनुसंधान की आवश्यकता पर जोर दिया।