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शिमला में हरे पेड़ों के कटान मामले में ग्रीन ट्रिब्यूनल का अहम फैसला

Sun, 04 Dec 2016 12:07 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला Updated Sun, 04 Dec 2016 12:07 AM IST
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National Green Tribunal bans cutting of trees in Shimla

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने शिमला शहर में हरे पेड़ों के कटान पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। एनजीटी ने यह प्रतिबंध प्रार्थी पूनम गहलोत की याचिका पर नई दिल्ली में सुनवाई करने के बाद लगाया। ट्रिब्यूनल के इन आदेशों से नगर निगम क्षेत्र के तहत हाल ही में दी गई हरे पेड़ों को काटने की परमिशन पर रोक लग गई है।

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एनजीटी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि ट्रिब्यूनल की इजाजत के बगैर शिमला नगर निगम परिक्षेत्र में किसी भी पेड़ को न काटा जाए। यदि किसी पेड़ को काटना निहायत ही जरूरी हो जाए तो उसे काटने की मंजूरी के लिए संबंधित विभाग ट्रिब्यूनल के समक्ष आवेदन कर सकता है। प्रार्थी का आरोप है कि शिमला शहर में नगर निगम की ट्री अथॉरिटी और वन विभाग ने बिना किसी ठोस आधार के सैकड़ों की संख्या में हरे पेड़ों को काटने की इजाजत दे दी।
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प्रार्थी का कहना है कि जान और माल को खतरा बने पेड़ों की आड़ में नगर निगम व वन विभाग ने करीब 287 पेड़ काटने की परमिशन जारी कर दी। इन पेड़ों को काटने की मंजूरी नियमों को ताक पर रखकर दे दी गई। साल 2014 में 202 पेड़ों को काटने की मंजूरी भी बिना तार्किक आधार के दी गई थी जिसे हिमाचल हाईकोर्ट ने खारिज करते हुए नए सिरे से खतरा बने पेड़ों को काटने की इजाजत हेतु पुनर्निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार करने को कहा था।

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पेड़ दुश्मन नहीं, मित्र हैं...

National Green Tribunal bans cutting of trees in Shimla

प्रार्थी का कहना है कि नए सिरे से दी गई मंजूरी की खामियों का पता उसे तब चला जब 31 अगस्त से 2 सितंबर के बीच हाईकोर्ट के पड़ोस में ही एक हरे भरे पेड़ को तीन दिनों के भीतर काट दिया गया। प्रार्थी ने ऐसा ही एक मामला कमला नेहरू अस्पताल के समीप हो

रहे निर्माण को देखने पर पाया कि मजदूर पेड़ के नीचे से मिट्टी खोद रहे थे और पेड़ की जड़ों को काट दिया गया था। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्रदेश सरकार से दो सप्ताह के भीतर याचिका का जवाब देने के आदेश देते हुए मामले पर अगली सुनवाई 16 जनवरी को निर्धारित की है। 

हरे भरे पेड़ों को सरकार सहित नगर निगम और कुछ चुनिंदा लोग अपना अपना दुश्मन मानते हुए इन्हें जड़ से खत्म करने के प्रयास में लगे हुए हैं जबकि इन्हें इतनी सी बात समझ में नहीं आ रही है कि पेड़ हमारे दुश्मन नहीं बल्कि सबसे बड़े मित्र हैं। 

आज पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने में इनका सबसे बड़ा योगदान है। इन्हें बचाने के लिये पर्यावरण की चिंता करने वाले बुद्धिजीवियों को बार बार अदालतों की शरण में जाना पड़ता है।

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