अनूठी मिसाल! यहां मुस्लिम परिवार के बिना शुरू नहीं होता हिंदुओं का ये मेला
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नाम खालिद। काम 17वीं शताब्दी से अपने पूर्वजों की तर्ज पर भगवान रघुनाथ को अर्पित करने के लिए मिंजर तैयार करना। यही परिवार मिंजर के प्रतीक के रूप में लगाए जाने वाले चिह्न को तैयार कर रहा है, जिसे भगवान रघुनाथ की मूर्ति पर अर्पित करने के साथ ही मेला शुरू होगा।
हिमाचल के चंबा में जहां आस्था और सनातन धर्म का संदेश मिल रहा है, वहीं हिंदू और मुस्लिम एकता का संदेश भी देश और दुनिया में फैल रहा है। सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल मिंजर पर्व यहां रविवार से शुरू हो रहा है।
मिर्जा परिवार के सदस्य खालिद और नदीम बाकी सदस्यों के साथ छह महीने से मिंजर बनाने में जुटे हैं। दस हजार मिंजर बनाने का लक्ष्य है। खालिद कहते हैं कि वे इस परंपरा को खत्म नहीं होने देना चाहते। उन्हें अच्छा लगता है कि मिंजर एकजुटता का संदेश देती है।
मिंजर बनाने में उनका पूरा परिवार लगता है और एक मिंजर को पूरा करने में 10 से 15 मिनट लगते हैं। वहीं, उपायुक्त सुदेश मोख्टा का कहना है कि मिंजर ऐतिहासिक क्षण है और इसे परंपरा के अनुसार मनाया जाएगा उन्होंने बताया कि मिंजर के उद्घाटन समारोह के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
17वीं शताब्दी से शुरू हुई थी परंपरा
चंबा की यह परंपरा 17वीं शताब्दी से शुरू हुई थी। उस समय चंबा के राजा पृथ्वी सिंह दिल्ली से लौटते वक्त कढ़ाई का काम करने वाले मिर्जा परिवार के कुछ लोगों को चंबा ले आए थे। इस परिवार ने यहां मिंजर पर जरी-गोटे, रेशम व सुनहरे धागे का काम शुरू किया और तब से यह परिवार मिंजर तैयार कर रहा है। इस परंपरा को मिर्जा परिवार में आज की पीढ़ी भी निभा रही है।
राज्यपाल करेंगे मेले का आगाज
मिंजर मेले का आगाज रविवार सुबह राज्यपाल आचार्य देवव्रत के चंबा आगमन से होगा। सुबह राज्यपाल नगर परिषद की ओर से आयोजित होने वाले जुलूस का हिस्सा बनेंगे और उसके बाद लक्ष्मी नारायण, वंशी-गोपाल, भगवान रघुनाथ और हरि राय मंदिर की परिक्रमा पूरी करने के बाद चौगान में झंडा चढ़ाने की रस्म अदा करेंगे। इस दौरान विभिन्न सांस्कृतिक दल नृत्य प्रस्तुत करेंगे। राज्यपाल दोपहर बाद शिमला लौट जाएंगे।
जीत का प्रतीक है चंबा का मिंजर मेला
मिंजर मेले का त्योहार चंबा के राजा की जीत के रूप में मनाया जाता है। इतिहासकार मानते हैं कि 17वीं शताब्दी में चंबा के राजा कांगड़ा पर जीत हासिल कर लौटे थे। उस समय बरसात का मौसम था और उनकी जीत पर चंबा के लोगों ने मक्की की झालर देकर उनका स्वागत किया था। चंबा रियासत में इस जीत के अवसर को मिंजर के रूप में मनाया जाने लगा और यह परंपरा आज तक जारी है।
डेढ़ हजार मां-बेटियां करेंगी नृत्य
इस बार मिंजर मेले में बेटी बचाओ कार्यक्रम को भी शामिल किया गया है। इस कार्यक्रम में डेढ़ हजार मां-बेटियां नृत्य करेंगी। नगर परिषद अध्यक्ष नीलम नैय्यर ने बताया कि नगर परिषद ने मिंजर के आगाज के लिए जुलूस व भगवान रघुनाथ समेत अन्य देवताओं की पूजा को लेकर सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं।