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Kullu News: बिजली परियोजनाओं से भी खोखले हो रहे हैं पहाड़, कमजोर होकर दरकने की यह भी एक वजह

Thu, 20 Jul 2023 09:57 AM IST
Krishan Singh रोशन ठाकुर, संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
रोशन ठाकुर, संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू Published by: Krishan Singh Updated Thu, 20 Jul 2023 09:57 AM IST
सार

जिला कुल्लू के बिजली प्रोजेक्टों के निर्माण से पहाड़ नाजुक होने लगे हैं। इससे पहाड़ कमजोर होकर दरकने लगे हैं। जिला कुल्लू में करीब 20 बिजली प्रोजेक्ट हैं। 

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Mountains becoming hollow due to the construction of power projects
लारजी पावर हाउस में पानी भरने से भारी नुकसान। - फोटो : संवाद

विस्तार

उत्तर भारत को रोशन करने वाले जिला कुल्लू के बिजली प्रोजेक्टों के निर्माण से पहाड़ नाजुक होने लगे हैं। इससे पहाड़ कमजोर होकर दरकने लगे हैं। जिला कुल्लू में करीब 20 बिजली प्रोजेक्ट हैं।  इसमें अधिकतर का निर्माण पूरा हो गया है। कुछ का निर्माण चल रहा है। जिले में बाह्य सराज आनी-निरमंड से लेकर मनाली तक हर नदी-नालों पर प्रोजेक्ट बने हैं। इसमें 10 के करीब बड़े प्रोजेक्ट हैं, जिसकी उत्पादन क्षमता 100 मेगावाट से अधिक है। इतने ही माइक्रो प्रोजेक्ट हैं। उसमें एक से पांच मेगावाट तक बिजली पैदा हो रही है। इन प्रोजेक्टों में दस से 12 सुरंगों को निर्माण किया गया है। हजारों के हिसाब से हर भरे पेड़ों को काटा गया है। इसकी एवज में कुछ ही पेड़ों को लगाया जाता है। 

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ब्यास में बाढ़ से हिमाचल प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड का लारजी में 126 मेगावाट का प्रोजेक्ट पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है। इसमें बिजली उत्पादन पूरी तरह से ठप है। 10 जुलाई को ब्यास, पार्वती, तीर्थन तथा सैंज नदी में आई बाढ़ से प्रोजेक्ट पूरी तरह तहस-नहस हो गया है। पावर हाउस में बाढ़ का पानी और मलबा घुसा है। प्रोजेक्ट को 658 करोड़ का नुकसान आंका गया है। 
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बिजली प्रोजेक्टों का अवैज्ञानिक तरीके से निर्माण के साथ फोरलेन, हाईवे और ग्रामीण सड़कों से निकलने वाले मलबे को डंपिंग साइटों के बजाय नदी-नालों में फेंका जाता है। 9 और 10 जुलाई को हुई तबाही इसका एक कारण है।-गुमान सिंह, संयोजक, हिमालय नीति अभियान  
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प्रोजेक्टों, फोरलेन और सड़कों के निर्माण में अनगिनत पेड़ों को काटा जाता है। इसकी एवज में पौधा रोपण शून्य के बराबर होता है। पर्यावरण को बचाने तथा धरती की मजबूती के लिए एक पेड़ की बदले दस पौधों को लगाया जाना चाहिए। -किशन लाल, पर्यावरणविद

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