{"_id":"6276a9b925f80c48e34bb787","slug":"mother-s-day-mother-s-insistence-and-struggle-made-divyang-son-para-athletics-champion","type":"story","status":"publish","title_hn":"Mother's Day: मां की जिद और संघर्ष ने दिव्यांग बेटे को बना दिया पैरा एथलेटिक्स चैंपियन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Mother's Day: मां की जिद और संघर्ष ने दिव्यांग बेटे को बना दिया पैरा एथलेटिक्स चैंपियन
Sun, 08 May 2022 12:17 PM IST
Krishan Singh
उमेश कुमार शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर
उमेश कुमार शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर
Published by: Krishan Singh
Updated Sun, 08 May 2022 12:17 PM IST
सार
एक मां के संघर्ष और जिद ने दिव्यांग बेटे को पैरा एथलेटिक्स में पदक जीतने के काबिल बना दिया। चिकित्सकों ने दिव्यांग बेटे को अपने पैरों पर खड़ा होने और बोलने में असमर्थ बता दिया था, लेकिन हमीरपुर विकास खंड के गांव चौकी जंवाला की सुनीता ने हिम्मत नहीं हारी।
विज्ञापन
अपने बेटे के साथ सुनीता।
- फोटो : संवाद
विस्तार
एक मां के संघर्ष और जिद ने दिव्यांग बेटे को पैरा एथलेटिक्स में पदक जीतने के काबिल बना दिया। चिकित्सकों ने दिव्यांग बेटे को अपने पैरों पर खड़ा होने और बोलने में असमर्थ बता दिया था, लेकिन हमीरपुर विकास खंड के गांव चौकी जंवाला की सुनीता ने हिम्मत नहीं हारी।
विज्ञापन
बेटे का हर संभव इलाज करवाया। दर्जनों अस्पतालों में भटकीं। सैकड़ों चिकित्सकों से उपचार और परामर्श लिया। अधिकतर चिकित्सकों से यही सुनने को मिला कि आपका बेटा चल फिर और बोल नहीं सकेगा। अंत में चंडीगढ़ में एक चिकित्सक के उपचार के बाद बेटे ने हरकत करना शुरू की। उपचार के साथ-साथ मां के दृढ़संकल्प से बेटे में और सुधार हुआ।
विज्ञापन
दवाइयां और मां की देखभाल के बाद बेटा अपने पैरों पर खड़ा हुआ और अब राष्ट्रीय स्तर का पैरा धावक है। सुनीता की प्री मैच्योर डिलीवरी होने के बाद बेटा दिव्यांग पैदा हुआ। वह न चल फिर सकता था और न ही बोल सकता था। जब बेटा तीन साल का हुआ तो सुनीता के पति की मौत हो गई। इससे उस पर दुखों का पहाड़ टूट गया।
विज्ञापन
पति की मृत्यु के बाद बेटे को ठीक करने का संकल्प लेकर वह हर अस्पताल, हर क्लीनिक गईं और अंत में बेटे को अपने पैरों पर खड़ा कर उसे पैरा धावक बनाया है। सुनीता का कहना है कि उसका बेटा 20 साल का है और वह एक पल भी उससे दूर नहीं रहती हैं। उसके जन्म के समय वह महज 700 ग्राम का था, उन्हें जिद थी कि वह अपने बच्चे को पैरों पर खड़ा करेंगी।
इसी जिद, दृढ़संकल्प और संघर्ष के बाद बेटा अब पैरा धावक है और बीए द्वितीय वर्ष का छात्र है। सुनीता ने कहा कि वह अपने बेटे के साथ हर प्रतियोगिता में जाती हैं और उसका उत्साहवर्धन करती हैं। बेटा भी मां के संघर्ष और प्यार के चलते मेहनत कर रहा है और दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में चार से सात मई तक हुई राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता है। वह पैरा एथलेटिक्स में दो राज्य, एक राष्ट्र स्तर की प्रतियोगिता में भी हिस्सा ले चुका है। सुनीता विकास खंड कार्यालय हमीरपुर में एलवीडीसी पद पर कार्यरत हैं।