'क्यों नहीं मिल रहे हैं हमारे बच्चे'
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पिछले सात दिनों से अपने बच्चों की तलाश में ब्यास नदी पर टकटकी लगाए परिजनों की उम्मीदें अब टूटने लगी है। पिछले दो दिनों के सर्च ऑपरेशन में कोई भी शव न मिलने से परिजन पूरी तरह से हताश हो चुके हैं।
हादसे के छठे और सातवें दिन कोई भी शव न मिलने से छात्रों के परिजन टूट से गए। परिजनों को उम्मीद थी कि नदी का पानी बंद होने के बाद उन्हें उनके बच्चों के शव मिल जाएंगे। लेकिन शनिवार को भी कोई शव न मिलने से अभिभावक मायूस दिखे।
दिन भर ब्यास नदी के किनारे भटक रहे अभिभावक लोगों से पूछ रहे थे, कि उनके बच्चों के शव क्यों नहीं मिल रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि उन्हें उनके बच्चों के शव मिल जाएं तो वे वापस अपने घर चले जाएंगे।
अब निराश होते जा रहे परिजन
अपने भतीजे डी तरुण की तलाश कर रहे चाचा प्रभाकर राव ने कहा कि दो दिन से सर्च अभियान में जुटे लोगों के हाथ कुछ नहीं लग रहा है। इससे सभी बच्चों के अभिभावक मायूस हो गए हैं।
उन्होंने कहा कि बस उनके बच्चे का शव मिल जाए और वे वापस अपने प्रदेश चले जाएं। अपने भांजी किरण कुमार की तलाश में नदी किनारे भटक रहे नरसिम्हमा राव ने बताया कि बच्चे का शव न मिलने से वे पूरी तरह टूट गए हैं।
हादसे का शिकार हुए आशीष के चाचा रामानंद ने बताया कि वे कई दिनों से ब्यास के किनारे अपने बच्चे के शव की तलाश में भटक रहे हैं, लेकिन कुछ हाथ नहीं आ रहा है।
दस-पंद्रह दिन बाद फूलकर ऊपर आते हैं शव
जानकारों का कहना है कि ब्यास नदी का पानी बहुत ठंडा है। इस कारण सिल्ट में फंसे शव फूलने में समय लेते हैं। इसी कारण ये शव अभी पानी की सतह के ऊपर नहीं आ रहे हैं।
लोगों का कहना है कि ब्यास नदी में दस-पंद्रह दिन बाद फूलने के बाद शव ऊपर आते हैं। यहां हुए हादसों के बाद अक्सर ऐसा ही होता है। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि कुछ दिनों के बाद शव खुद ही पानी में उतराते मिल जाएंगे।
सर्च ऑपरेशन से हताश अभिभावक अब स्थानीय लोगों से पूछ रहे हैं कि ब्यास नदी में शव क्यों नहीं मिल रहे हैं। इसका क्या कारण हैं। वह असमंजस में हैं कि जब उनके बच्चे नदी में बहे हैं तो फिर कहां चला गए।