लेक्चरर काडर को हाईकोर्ट से बड़ी राहत: प्रभार की तारीख से मिलेगा प्रधानाचार्य का उच्च वेतनमान, अधिसूचना रद्द
खंडपीठ ने राज्य सरकार की उस अधिसूचना को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसके तहत लेक्चरर (डायरेक्ट) से प्रधानाचार्य (स्कूल काडर) का कार्यभार संभालने वाले शिक्षकों को उच्च वेतनमान और वित्तीय लाभ देने से इन्कार किया गया था।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के लेक्चरर कैडर को बड़ी राहत दी है। खंडपीठ ने राज्य सरकार की उस अधिसूचना को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसके तहत लेक्चरर (डायरेक्ट) से प्रधानाचार्य (स्कूल काडर) का कार्यभार संभालने वाले शिक्षकों को उच्च वेतनमान और वित्तीय लाभ देने से इन्कार किया गया था। अदालत ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ताओं को प्रधानाचार्य पद का कार्यभार संभालने की मूल तिथि से ही उच्च वेतनमान, बकाया और सभी परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं।
खंडपीठ ने राज्य सरकार को सख्त आदेश दिया
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार को सख्त आदेश दिया है कि याचिकाकर्ताओं को प्रधानाचार्य पद का प्रभार संभालने की वास्तविक तिथि से उच्च वेतनमान की गणना की जाए और सभी बकाया (एरियर) का भुगतान 30 नवंबर तक अनिवार्य रूप से कर दिया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि हेडमास्टर और लेक्चरर दोनों ही प्रधानाचार्य पद के लिए फीडर कैडर हैं। जब एक कैडर को कार्यभार संभालने की तिथि से वित्तीय लाभ दिए गए हैं, तो दूसरे कैडर को इससे वंचित रखना संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
अदालत ने सरकार के प्लेसमेंट वाले तर्क को किया खारिज
अदालत ने राज्य सरकार के प्लेसमेंट वाले तर्क को खारिज करते हुए कहा कि प्लेसमेंट केवल समान श्रेणी या पद के बीच होता है। किसी निचले (फीडर) कैडर के कर्मचारी को उच्च पद का कार्य सौंपकर उसे केवल प्लेसमेंट बताना कानूनी रूप से भ्रामक है। अदालत ने फंडामेंटल रूल 49 का उल्लेख करते हुए कहा कि जब किसी सरकारी कर्मचारी से किसी उच्च पद का पूरा कार्यभार लिया जाता है, तो वह उस उच्च पद के वेतनमान का पूर्ण हकदार होता है। विभाग काम लेने के बाद उचित वेतन देने से मना नहीं कर सकता। अदालत ने 8 मई 2025 की उस विवादित अधिसूचना को रद्द कर दिया है, जिसने पिछली अवधि के वित्तीय लाभों पर रोक लगाई थी।
उल्लेखनीय है कि शिक्षा विभाग में नियमित लेक्चरर के रूप में सेवा दे रहे सुरेंद्र सिंह और अन्य शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। 2020 में राज्य सरकार ने नियमित पदोन्नति (डीपीसी) करने के बजाय इन शिक्षकों को केवल प्लेसमेंट आधार पर अपने ही वेतनमान में प्रधानाचार्य का पद सौंप दिया था। उस समय शर्त रखी गई थी कि इन्हें उच्च पद का कोई अतिरिक्त वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा। 8 मई 2025 को विभाग ने डीपीसी की सिफारिशों पर इन्हें नियमित प्रधानाचार्य तो बनाया, लेकिन वित्तीय लाभ केवल नई तारीख से देने का निर्णय लिया। इसके खिलाफ शिक्षकों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि हेडमास्टरों को जब यह लाभ दिया जा रहा है तो फिर लेक्चररों से भेदभाव क्यों।
एलर्जली भवन के पास अवैध निर्माण मामले में हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
प्रदेश हाईकोर्ट ने छोटा शिमला के ऐतिहासिक एलर्जली भवन के पास अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन पर सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है। न्यायाधीश संदीप शर्मा और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने न्यायमित्र की दलीलें सुनने के बाद राज्य सरकार को इस पूरे मामले पर 3 सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब अथवा शपथपत्र दाखिल करने का आदेश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 5 नवंबर को होगी। अदालत ने कैप्टन अतुल शर्मा की शिकायत पर यह संज्ञान लिया है। अदालत को सूचित किया गया कि छोटा शिमला में स्थित ऐतिहासिक एलर्जली भवन में वर्तमान में हिमाचल प्रदेश का सचिवालय चलता है, उसके ठीक पास कंक्रीट का नया ढांचा खड़ा किया जा रहा है। यह नया निर्माण ऐतिहासिक इमारत को पूरी तरह से दबा रहा है और उसके कुछ हिस्सों को छू रहा है। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि इस निर्माण में अनिवार्य सेटबैक नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। इसके लिए 17 अगस्त को कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता को न्यायमित्र नियुक्त किया। याचिका में एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय कमेटी बनाकर जांच करने और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उन पर कार्रवाई करने की मांग की गई है।