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सत्ता संग्राम 2019: कांगड़ा सीट पर गद्दी कार्ड की काट को चला ओबीसी पर दांव

Thu, 04 Apr 2019 11:26 AM IST
अरविन्द ठाकुर सुनील चड्ढा, अमर उजाला, शिमला
सुनील चड्ढा, अमर उजाला, शिमला Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Thu, 04 Apr 2019 11:26 AM IST
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lok sabha election 2019 competition between pawan kajal and kishan kapoor
पवन काजल - फोटो : फाइल फोटो

कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों ने हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी साढ़े 13 लाख मतदाताओं वाली कांगड़ा-चंबा संसदीय सीट पर जातीय कार्ड को तरजीह दी है। चुनावी अखाड़े में भाजपा उम्मीदवार गद्दी नेता किशन कपूर के सामने कांग्रेस ने भी ओबीसी नेता पवन काजल को उतारकर इसके साफ संकेत दे दिए हैं।

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जीएस बाली, सुधीर शर्मा सरीखे कद्दावर नेताओं के बजाय कांग्रेस ने साधारण व्यक्तित्व वाले पवन काजल पर भरोसा जताया है। कांगड़ा जिले में सबसे ज्यादा 25-30 फीसदी वोट बैंक ओबीसी का है, जिस पर नजर गड़ाए कांग्रेस ने भाजपा के गद्दी कार्ड की काट निकालने का सियासी पैंतरा चला है। वर्ष 2004 में भी कांग्रेस ने ओबीसी कार्ड खेलकर चंद्र कुमार को मैदान में उतार कर शांता कुमार को पटकनी दी थी।

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कुछ और ही कहते हैं हार-जीत के आंकड़े

दिलचस्प यह भी है कि पिछले चार दशकों में कांगड़ा-चंबा सीट पर जातिवाद का कार्ड नहीं चला। दरअसल, 1977 के बाद वर्ष 2014 तक के चुनावी परिणामों को देखें तो 1980 और 1984 में लगातार दो बार ओबीसी नेता चौधरी सरवण कुमार हार गए। 1980 में करीब 3 फीसदी वोट बैंक वाले समुदाय से विक्रम चंद महाजन ने ओबीसी नेता को हराया था। 1996 में इसी सीट पर तीन फीसदी समुदाय वाले सत महाजन ने ब्राह्मण नेता शांता कुमार को हराया था।

ओबीसी नेता चंद्र कुमार वर्ष 2008 और 2014 में लगातार हारे थे। हालांकि, 2004 में उन्होंने जीत दर्ज जरूर की थी लेकिन उस दौरान उनकी जीत के लिए हिमाचल कांग्रेस सरकार में कांगड़ा-चंबा जिलों के आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों ने भूमिका निभाई थी। इस आंकड़े का विश्लेषण करें तो पिछले चार दशकों में कांगड़ा-चंबा सीट पर जातीय कार्ड ध्वस्त होता दिखा।

विधायकों में टक्कर, दोनों का डीएनए भाजपा का

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किशन कपूर - फोटो : फाइल फोटो

धर्मशाला से भाजपा उम्मीदवार किशन कपूर और कांगड़ा से कांग्रेस के पवन काजल दोनों विधायक हैं। सांसद बनने के लिए दो विधायकों में टक्कर होगी। दोनों में अगर कोई भी हारा तो ज्यादा नुकसान नहीं होगा क्योंकि हार के बाद भी विधायकी बची रहेगी। दिलचस्प यह भी है कि दोनों नेताओं का डीएनए भाजपा का है। चूंकि, कांग्रेस में शामिल होने से पहले पवन काजल भी भाजपा के हार्डकोर कार्यकर्ता रहे चुके थे।

पाने से ज्यादा खोने का डर
भाजपा और कांग्रेस उम्मीदवार के लिए पाने से ज्यादा खोने का डर रहेगा। किशन कपूर दिल्ली की भीड़ में खोने से बेहतर मंत्री पद पर सुखद महसूस कर रहे थे लेकिन राजनीति के भविष्यमयी गणित में वे फंस गए। उधर, विरोधियों की चुनौतियों की आग में तपकर कांगड़ा से लगातार दो बार विधायक बने पवन काजल अगर सांसद बने तो स्थानीय राजनीति से हाथ धोना पड़ सकता है।

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