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Shimla News: गोबर की लिपाई पर चावल के आटे से उकेरी जीवन शैली
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गेयटी में आयोजित प्रदर्शनी में महाराष्ट्र का ट्राइबल वारली आर्ट बना आकर्षण का केंद्र
घरों की दीवारों पर यह चित्रकारी करती हैं महिलाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। महाराष्ट्र के आदिवासी कारीगरों ने कैनवस पर गोबर की लिपाई कर चावल के आटे से अपनी जीवन शैली को दर्शाया है। गेयटी थियेटर के टेवरन हॉल में ट्राइफेड द्वारा आयोजित समृद्ध जनजातीय विरासत के उत्पादों की प्रदर्शनी में यह कला आकर्षण का केंद्र बनी हुई। इसे वारली आर्ट कहा जाता है।
इसमें ज्यामितीय आकार जैसे वृत्त, त्रिकोण और रेखाओं का प्रयोग होता है। यह कला प्रकृति, रोजमर्रा के जीवन, सामुदायिक अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों को दर्शाती है। ट्राइफेड के सदस्य पवन कुमार ने बताया कि पारंपरिक रूप से यह कला पुराने समय में महिलाओं द्वारा घरों की दीवारों पर मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से की जाती थी। त्योहारों के दौरान घरों को सजाने के लिए महिलाएं दीवारों पर पहले गोबर से लिपाई करती थीं उसके बाद चावल की पिसाई कर उसका आटा बनाती थी। आटे में पानी मिलाकर उससे दीवारों पर अलग-अलग तरह से चित्रकारी करती थीं। प्रदर्शनी में दर्शाए चित्र में भी यही विधि अपनाई गई है जो लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई है। गेयटी में इस चित्र का मूल्य 1326 रुपये से 10 हजार रुपये तक निर्धारित किया है। प्रदर्शनी में मध्य प्रदेश के भील आर्ट, गोंड आर्ट, गुजरात के पिथोरा आर्ट के चित्र भी प्रदर्शित किए हैं। ट्राइफेड की सदस्य सावित्री नेगी ने बताया कि 17 सितंबर तक आयोजित इस प्रदर्शनी के माध्यम से आगंतुकों को भारत के जनजातीय समुदायों की विविध और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं का अनुभव करने का अवसर मिलेगा।
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घरों की दीवारों पर यह चित्रकारी करती हैं महिलाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। महाराष्ट्र के आदिवासी कारीगरों ने कैनवस पर गोबर की लिपाई कर चावल के आटे से अपनी जीवन शैली को दर्शाया है। गेयटी थियेटर के टेवरन हॉल में ट्राइफेड द्वारा आयोजित समृद्ध जनजातीय विरासत के उत्पादों की प्रदर्शनी में यह कला आकर्षण का केंद्र बनी हुई। इसे वारली आर्ट कहा जाता है।
इसमें ज्यामितीय आकार जैसे वृत्त, त्रिकोण और रेखाओं का प्रयोग होता है। यह कला प्रकृति, रोजमर्रा के जीवन, सामुदायिक अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों को दर्शाती है। ट्राइफेड के सदस्य पवन कुमार ने बताया कि पारंपरिक रूप से यह कला पुराने समय में महिलाओं द्वारा घरों की दीवारों पर मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से की जाती थी। त्योहारों के दौरान घरों को सजाने के लिए महिलाएं दीवारों पर पहले गोबर से लिपाई करती थीं उसके बाद चावल की पिसाई कर उसका आटा बनाती थी। आटे में पानी मिलाकर उससे दीवारों पर अलग-अलग तरह से चित्रकारी करती थीं। प्रदर्शनी में दर्शाए चित्र में भी यही विधि अपनाई गई है जो लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई है। गेयटी में इस चित्र का मूल्य 1326 रुपये से 10 हजार रुपये तक निर्धारित किया है। प्रदर्शनी में मध्य प्रदेश के भील आर्ट, गोंड आर्ट, गुजरात के पिथोरा आर्ट के चित्र भी प्रदर्शित किए हैं। ट्राइफेड की सदस्य सावित्री नेगी ने बताया कि 17 सितंबर तक आयोजित इस प्रदर्शनी के माध्यम से आगंतुकों को भारत के जनजातीय समुदायों की विविध और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं का अनुभव करने का अवसर मिलेगा।
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