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Shimla News: बद्दी में कारोबार छोड़ गांव लौटे, अब खेती कर कमा रहे लाखों
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टुटू विकास खंड के देवनगर गांव के किसान देवदत्त ने कृषि से बदली अपनी तकदीर, सालाना 10 लाख कारोबार
25 बीघा जमीन पर उगा रहे 30 तरह की फसलें
खास खबर
अनिल पंवार
शिमला। जिले में किसान प्राकृतिक खेती अपनाकर अपनी आर्थिकी बदल रहे हैं। शिमला जिले के टुटू विकास खंड के देवनगर गांव के किसान देवदत्त शर्मा ने 25 बीघा जमीन पर प्राकृतिक खेती का ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिससे वह सालाना करीब 8 से 10 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं। खेती का खर्च निकालने के बाद उन्हें 4 से 5 लाख रुपये तक की बचत हो रही है।
देवदत्त शर्मा ने बताया कि वह 25 बीघा जमीन पर 30 से अधिक प्रकार की फसलें प्राकृतिक तरीके से उगा रहे हैं। इनमें फल, अनाज और सब्जियां शामिल हैं। उन्होंने बताया कि इससे पहले वह सोलन जिले के बद्दी में ढाबा चलाते थे। इस कारोबार से उनके परिवार का गुजर-बसर तो होता था लेकिन तंगी रहती थी। वर्ष 2016 में पारिवारिक परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें अपना कारोबार छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने गांव लौटकर खेतीबाड़ी शुरू करने का फैसला किया। वर्ष 2018-19 में उनकी मुलाकात कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के अधिकारियों से हुई। अधिकारियों के मार्गदर्शन में उन्हें प्राकृतिक खेती की संभावनाओं को समझने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने प्राकृतिक खेती के विशेषज्ञ डॉ. सुभाष पालेकर से इसके तौर-तरीके सीखे। वर्ष 2019 में उन्होंने प्राकृतिक खेती को व्यवस्थित रूप से अपनाते हुए अपनी जमीन पर काम शुरू किया। शर्मा ने बताया कि उन्होंने प्राकृतिक खेती को केवल छोटे स्तर पर आजमाने के बजाय अपनी 25 बीघा जमीन को इसके लिए विकसित किया। साथ ही एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग मौसम में विभिन्न फसलें उगाने को प्राथमिकता दी। वर्तमान में वह हल्दी, मिलेट्स, मक्की, भिंडी, बीन, करेला और मिर्च जैसी फसलें उगा रहे हैं। इनके बगीचे में सेब, नाशपाती, खुरमानी, मौसमी और नींबू सहित विभिन्न फलदार पौधे भी हैं। इसके अलावा बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए वह विदेशी किस्मों की सब्जियों (एग्जॉटिक वेजिटेबल्स) की खेती भी कर रहे हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी हो रही है। देवदत्त शर्मा का मानना है कि खेती में सफलता के लिए केवल मेहनत करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही योजना बनाना, बाजार की मांग को समझना और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना भी जरूरी है।
नुकसान का जोखिम भी कम
देवदत्त शर्मा ने खेती की योजना इस तरह बनाई है कि अलग-अलग मौसम में विभिन्न फसलें तैयार होती रहें। इससे किसी एक फसल के खराब होने या बाजार में उसकी कीमत कम मिलने की स्थिति में दूसरी फसलें सहारा बनती हैं। कुछ फसलों पर सरकार की ओर से समर्थन मूल्य भी दिया जाता है, जिससे कीमतों को लेकर जोखिम कम करने में मदद मिलती है। इसके अलावा रासायनिक खेती में कीटनाशकों और अन्य कृषि रसायनों पर होने वाला खर्च भी उनकी खेती में नहीं होता। उन्होंने बताया कि 25 बीघा जमीन पर प्राकृतिक खेती से सालाना 8 से 10 लाख रुपये की कमाई हो रही है। इसमें से बीज, खेती की देखरेख, मजदूरी और अन्य जरूरी खर्च निकालने के बाद करीब 4 से 5 लाख रुपये की बचत हो जाती है।
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25 बीघा जमीन पर उगा रहे 30 तरह की फसलें
खास खबर
अनिल पंवार
शिमला। जिले में किसान प्राकृतिक खेती अपनाकर अपनी आर्थिकी बदल रहे हैं। शिमला जिले के टुटू विकास खंड के देवनगर गांव के किसान देवदत्त शर्मा ने 25 बीघा जमीन पर प्राकृतिक खेती का ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिससे वह सालाना करीब 8 से 10 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं। खेती का खर्च निकालने के बाद उन्हें 4 से 5 लाख रुपये तक की बचत हो रही है।
देवदत्त शर्मा ने बताया कि वह 25 बीघा जमीन पर 30 से अधिक प्रकार की फसलें प्राकृतिक तरीके से उगा रहे हैं। इनमें फल, अनाज और सब्जियां शामिल हैं। उन्होंने बताया कि इससे पहले वह सोलन जिले के बद्दी में ढाबा चलाते थे। इस कारोबार से उनके परिवार का गुजर-बसर तो होता था लेकिन तंगी रहती थी। वर्ष 2016 में पारिवारिक परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें अपना कारोबार छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने गांव लौटकर खेतीबाड़ी शुरू करने का फैसला किया। वर्ष 2018-19 में उनकी मुलाकात कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के अधिकारियों से हुई। अधिकारियों के मार्गदर्शन में उन्हें प्राकृतिक खेती की संभावनाओं को समझने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने प्राकृतिक खेती के विशेषज्ञ डॉ. सुभाष पालेकर से इसके तौर-तरीके सीखे। वर्ष 2019 में उन्होंने प्राकृतिक खेती को व्यवस्थित रूप से अपनाते हुए अपनी जमीन पर काम शुरू किया। शर्मा ने बताया कि उन्होंने प्राकृतिक खेती को केवल छोटे स्तर पर आजमाने के बजाय अपनी 25 बीघा जमीन को इसके लिए विकसित किया। साथ ही एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग मौसम में विभिन्न फसलें उगाने को प्राथमिकता दी। वर्तमान में वह हल्दी, मिलेट्स, मक्की, भिंडी, बीन, करेला और मिर्च जैसी फसलें उगा रहे हैं। इनके बगीचे में सेब, नाशपाती, खुरमानी, मौसमी और नींबू सहित विभिन्न फलदार पौधे भी हैं। इसके अलावा बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए वह विदेशी किस्मों की सब्जियों (एग्जॉटिक वेजिटेबल्स) की खेती भी कर रहे हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी हो रही है। देवदत्त शर्मा का मानना है कि खेती में सफलता के लिए केवल मेहनत करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही योजना बनाना, बाजार की मांग को समझना और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना भी जरूरी है।
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नुकसान का जोखिम भी कम
देवदत्त शर्मा ने खेती की योजना इस तरह बनाई है कि अलग-अलग मौसम में विभिन्न फसलें तैयार होती रहें। इससे किसी एक फसल के खराब होने या बाजार में उसकी कीमत कम मिलने की स्थिति में दूसरी फसलें सहारा बनती हैं। कुछ फसलों पर सरकार की ओर से समर्थन मूल्य भी दिया जाता है, जिससे कीमतों को लेकर जोखिम कम करने में मदद मिलती है। इसके अलावा रासायनिक खेती में कीटनाशकों और अन्य कृषि रसायनों पर होने वाला खर्च भी उनकी खेती में नहीं होता। उन्होंने बताया कि 25 बीघा जमीन पर प्राकृतिक खेती से सालाना 8 से 10 लाख रुपये की कमाई हो रही है। इसमें से बीज, खेती की देखरेख, मजदूरी और अन्य जरूरी खर्च निकालने के बाद करीब 4 से 5 लाख रुपये की बचत हो जाती है।
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