ऐतिहासिक कुल्लू दशहरा पर संकट के बादल
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सदियों से चले आ रहे ऐतिहासिक कुल्लू दशहरा पर संकट के बादल दिन दिन बढते जा रहे हैं तथा देव संसद के फैसले और हिमाचल उच्च न्यायालय दिए गए फैसले अलग अलग होने से लोगों देव समाज के लोगों में रोष फैला हुआ जिससे दशहरा को लेकर असमंजस की स्थिति बरकरार है।
कुल्लू के राज परिवार की दादी कहे जाने वाली देवी हडिम्बा दशहरा में आने से पूर्व अपने मंदिर ढुंगरी में शरद नवरात्रे के छटे , सातवें और आठवें नवरात्रे को दुर्गा पाठ किया जाता है तथा अंतिम दिन पूर्णाहुति के बाद विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। अगले दिन देवी का रथ अपने हारियानों के साथ कुल्लू के लिए निकल पडता है।
दसवीं के दिन कुल्लू राज घराने के आदेश पर एक व्यक्ति देवी हडिम्बा यानि राज परिवार की दादी को छडी भेजकर बुलावा भेजता है तथा देवी उसके पश्चात सुल्तानपुर रवाना होती है तथा सुल्तानपुर में रघुनाथ के मंदिर में हाजरी भरने के पश्चात देवी राज महल में देवी प्रवेश करती है।
हडिम्बा को दी जाती है बलि
केवल देवी को राज महल के उस कमर में बैठाया जाता है जहां पर सिवाए राज परिवार क कोई अन्य नहीं जाता है राजा देवी के रथ के दर्शन उस समय तक नहीं करते जब तक कुल्लू के राज परिवार का मुख्य महल में देवी के मंदिर में पूजा अर्चना नहीं कर लेते उसके पश्चात देवी के दर्शन करते हैं तथा पूजा अर्चना कर देवी से दशहरा को बिना किसी विघन वाधा को सम्पन्न करने के लिए कहते हैं तथा आर्शीवाद लेते हैं देवी से दशहरा को संपन्न करने के लिए उपस्थित में रहने लिए आग्रह किया जाता है।
अंत में दशहरा ठीक प्रकार से संपन्न होने पर लंका दहन वाले दिन अष्टांग हडिम्बा को बलि दी जाती है यह परंपरा तब से आरंभ हुई है जब से ऐतिहासिक कुल्लू दशहरा आरंभ हुआ है। कुल्लू के राज परिवार के सदस्य देवी का आर्शीवाद लेकर अष्टांग बलि देने के लिए जाते हैं।
प्रदेश सरकार द्वारा दशहरा अपने हाथों में लेने से पहले कुल्लू के राज परिवार द्वारा यह अष्टांग बलि दी जाती थी लेकिन जब से प्रदेश सरकार द्वारा दशहरा का आयोजन अपने हाथों में लिया है तब से दशहरा कमेटी द्वारा अष्टांग बलि प्रथा को जारी रखा है तथा इस बार हाई कोट के आदेश क अनुसार बलि प्रथा पर रोक लगा दी गई है।
इसलिए दी जाती है अष्टांग बलि
ऐतिहासिक दशहरा में प्रत्येक दिन लाखों लोग प्रतिदिन दूर दूर से आते हैं तथा दशहरा में किसी प्रकार की अप्रिया घटना न घटे कोई जन धन की हानि न हो किसी प्रकार की अव्यवस्था न फैले जिसके चलते प्रथा अनुसार अष्टांग बलि दी जाती है, लेकिन इस वार हिमाचल हाइकोर्ट द्वारा हाल ही में दिए गए बलि प्रथा पर रोक के निर्णय से ऐतिहासिक कुल्लू दशहरा पर संकट के बाद छाए गए हैं।
देव संसद द्वारा शुक्रबार को जगती में सुनाए गए फैसले में बलि प्रथा को जारी रखने का फरमान जारी किया है। जिसके चलते देवी हडिम्बा के दशहरा में जाने पर शंका के बादल छा गए हैं। देवी हडिम्बा के कारदार और मुख्य पुजारी रोहित राम शर्मा ने कहा कि देवी को दुर्गा के काली रूप में पूजा जाता है।
देवी को दशहरे में अष्टांग बलि सदियों से चली आ रही तथा परंपरा के अनुसार दी जाती है यदि बलि नहीं दी गई तो देवी का दशहरा में जाना तय नहीं है यदि मान मनोबल से दशहरा में देवी जाती है तो लंका दहन में भाग नहीं लेगी जो की पहली बार दशहरा के आरंभ से आजतक पहली बार परंपरा से हट कोई घटना होगी।
न्याय पाने के लिए जाएंगे सुप्रीम कोट
रघुनाथ के छडीबदार महेश्वर सिंह ने कहा कि वह न्यायालय का सम्मान करते हैं लेकिन हाई कोट के आदेश से पूरे देव समाज को निराशा हाथ लगी है तथा न्याय पाने के लिए वह और कारदार संघ दो दिन के भीतर सुप्रीम कोट का दरवाजा खटखटाएंगे।
उन्होने कहा कि देव संसद में सभी देवी देवताओं ने बलि प्रथा को जारी रखने का आदेश दिया है जिसमें देवताओं ने कहा है कि इस कार्य में मुश्किलें तो हुत आएंगी लेकिन अंत में जीत देव समाज की होगी और देवता स्वयं ही बल देंगे।
उपायुक्त कुल्लू एंव दशहरा कमेटी कुल्लू के चेयर मैन राकेश कंवर ने कहा कि हाई कोट का आदेश सर्व मान्य है तथा हर हाल में कोट के आदेश की पालना की जाएगी तथा दशहरा में अष्टांग बलि नहीं दी जाएगी तथा देवी हडिम्बा सहित अन्य देवी देवताओं को निमत्रण भेज दिए गए हैं।
अष्टांग बलि में भैसा , बकरा , मुर्गा , केकडा , सूअर ,मछली की बलि तथा पेठा और नारयिल की सात्विक बलि दी जाती है।