खुशवंत की राख से बना पाकिस्तान का स्कूल
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इसे जन्मभूमि से इश्क कहें या जड़ों की तरफ वापसी की बेपनाह हसरत। खुशवंत सिंह पाकिस्तान के रेगिस्तान की गोद में बसे अपने छोटे से गांव हडाली को कभी भूल नहीं पाए। जिंदगी के अंतिम लम्हों में उन्होंने पाकिस्तान में अपने पैतृक गांव हडाली में दफन होने की इच्छा जाहिर की।
यह इच्छा पूरी तो नहीं हुई, लेकिन उनकी हड्डियों की राख से स्कूल की मरम्मत हुई और वहां पत्थर के बने स्मृति चिन्ह में लिखा गया कि-खुशवंत सिंह की याद में ‘यह वह स्थान है, जहां मेरी जड़े हैं, जिसे मेरे आंसुओं और तकलीफ ने सींचा है’। सदी के महान लेखक खुशवंत सिंह की रूह पाकिस्तान में बसती थी।
खुशवंत सिंह पर लिखी द लिजेंड लिवस ऑन किताब में इस हकीकत को पिरोने वाले पाकिस्तान के लेखक और इतिहासकार फकीर सैय्यद एजाजुद्दीन ने खास बातचीत में कई अनछुए पहलू साझा किए। वह खुशवंत सिंह के तीसरे लिटफेस्ट में शिरकत करने पहुंचे हैं।
‘मैं हडाली में जन्मा हूं और जन्म से पाकिस्तानी हूं'
शुक्रवार देर शाम कसौली क्लब लाइब्रेरी में बातचीत में उन्होंने बताया कि खुशवंत सिंह ने अपनी मौत के पंद्रह दिन पहले भेजे संदेश में लिखा था कि ‘मैं हडाली में जन्मा हूं और जन्म से पाकिस्तानी हूं, मैंने अपने बच्चों को कहा है कि मुझे हडाली में ही दफनाएं’। 20 मार्च 2014 को सदी के महान लेखक की सुनहरी कलम रुक गई।
खुशवंत सिंह की बेटी माला को फोन पर सांत्वना दी। कहा कि क्या तुम उनकी हड्डियों की राख बचाकर रखोगी, मैं उसे पाकिस्तान में लाना चाहता हूं’। राहुल सिंह से बात करने के बाद उन्होंने कहा कि हमने राख का हिस्सा बचाकर रखा है, जब भी दिल्ली आना हो, तो उसे ले जाना।
बकौल फकीर सैय्यद एजाजुद्दीन 18 अप्रैल को वह दिल्ली पहुंचे। बागा अटारी होते हुए वह उनकी हड्डियों की राख ट्रेन के जरिए पाकिस्तान के हडाली ले गए। जहां स्कूल की मरम्मत के सीमेंट में उनकी राख मिलाई और मार्बल स्टोन भी उसी सीमेंट से लगाया। पूछने पर कि ट्रेन ही क्यों? उन्होंने कहा कि भारत पाक के विभाजन के वक्त ट्रेन टू पाकिस्तान से वह भारत पहुंचे।
इसी किताब ने उन्हें शोहरत दिलाई और अब इसी ट्रेन से उनकी अस्थियां वापस पाकिस्तान पहुंचाईं। यह काफी मायने रखता है। सदी के महान लेखक खुशवंत सिंह ने मरते दम तक दोनों देशों के बीच संबंधों की कमजोर डोर को मजबूत करने की कोशिश जारी रखी।
1987 में खुशवंत पहुंचे थे हडाली
एजाजुद्दीन के मुताबिक पाकिस्तान छोड़ने के बाद खुशवंत सिंह पहली बार 1987 में हडाली आए थे। करीब 500 छात्र गेट टू गेदर में एकत्र हुए। हैडमास्टर मोहम्मद फारूख राणा ने खुशवंत का इस्तकबाल किया और हदाली का बेटा बुलाया था। इस पर वह गदगद हो उठे थे और ट्रेन टू पाकिस्तान भेंट करते हुए आंखें नम की थीं।
सिंह इज किंग
लेखक खुशवंत सिंह की आटोबायोग्राफी ट्रूथ लव एंड ए लिटल मैलिस में जिक्र किया गया है कि जब वह पैदा हुए तो उनके पिता सोभा सिंह या दादा सुजान सिंह ने उनके जन्म की तारीख किसी डायरी में दर्ज करने की जहमत नहीं उठाई।
बाद में दिल्ली के माडर्न स्कूल में दाखिले के वक्त उनकी जन्मतिथि 2 फरवरी 1915 दर्ज कराई गई। लेकिन उनकी दादी के मुताबिक वह भादो में पैदा हुए थे। इसलिए खुशवंत अपना जन्म अगस्त महीने में मानते थे। वह खुद को सिंह राशि का मानते थे।
फूल को फूल रहने दो, कांटे जख्म देते हैं
एजाजुद्दीन से जब पूछा गया कि पाकिस्तान और भारत बार्डर के बीच टेंशन है। इस टेंशन के बीच कसौली में पहुंचने तक उन्हें कोई परेशानी तो नहीं आई। वह कुछ देर चुप रहने के बाद मजाकिया अंदाज में बोले - क्यों क्या यहां किसी ने गोली मार दी है?
फिर शायराना अंदाज में बोले - फूल को फूल ही रहने दो, कांटे जख्म देते हैं। उनका इशारा था कि इस इवेंट को बार्डर के तनाव से दूर रखो।