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कारगिल युद्ध शहीद: विक्रम बतरा की शहादत की जीवनी पाठ्यक्रम में नहीं जुड़ने का मलाल
Fri, 02 Jul 2021 01:12 PM IST
Krishan Singh
विनोद राणा, अमर उजाला, पालमपुर (कांगड़ा)
विनोद राणा, अमर उजाला, पालमपुर (कांगड़ा)
Published by: Krishan Singh
Updated Fri, 02 Jul 2021 01:12 PM IST
सार
शहीद विक्रम बतरा के परिजन चाहते हैं कि उनके बेटे के कारगिल युद्ध की जीवनी सीबीएसई सेकेंडरी पाठ्यक्रम और हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड की किताबों में भी जुड़े। इससे बच्चे उनकी बहादुरी से प्रेरणा ले सकें।
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शहीद कैप्टन विक्रम बतरा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
कारगिल युद्ध में शहादत पाने वाले परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन विक्रम बतरा के परिजनों को उनके बेटे की शहादत की जीवनी किसी पाठ्यक्रम में न जुड़ने का आज भी मलाल है। हालांकि, उन्हें अपने बेटे की शहादत पर गर्व है। शहीद विक्रम बतरा के परिजन चाहते हैं कि उनके बेटे के कारगिल युद्ध की जीवनी सीबीएसई सेकेंडरी पाठ्यक्रम और हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड की किताबों में भी जुड़े। इससे बच्चे उनकी बहादुरी से प्रेरणा ले सकें। परिजनों ने केंद्र सरकार को एक साल पहले पत्र लिखा था, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। यह पत्र शहीद कैप्टन विक्रम बतरा के पिता जीएल बतरा ने मोदी सरकार को पहले कार्यकाल में लिखा था।
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उनका कहना है कि जैसे सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और मंगलपांडे जैसे वीरों का नाम पाठ्यक्रम में जोड़ा गया है, वैसे ही कैप्टन विक्रम बतरा व अन्य शहीदों की जीवनी को पाठ्यक्रम में जोड़ा जाना चाहिए। कैप्टन विक्रम बतरा कारगिल युद्ध में 4875 चोटी पर सात जुलाई को शहीद हुए थे। उनका यह नारा आज भी दिल मांगे मोर हर भारतीय की जुबां पर है। विक्रम बतरा ने 4875 चोटी फतह कर ली थी। उन्होंने कई पाकिस्तानी जवानों को मार गिराया था। अब वह जीत की खुशी में नारा दे ही रहे थे कि यह दिल मांगे मोर, एक गोली उनका सीना चीरती हुई वहां से निकल गई थी। लिहाजा, मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
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