शिमला में सामने आया सुभाषचंद्र बोस से जुड़ा ये सच
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत के एक रहस्य की जांच शिमला में हुई थी। यह जांच पिछली एनडीए सरकार ने करवाई थी। वर्ष 2002 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस और फैजाबाद के गुमनामी बाबा की हैंड राइटिंग का शिमला के सरकारी परीक्षक प्रश्नास्पद प्रलेख (जीईक्यूडी) में मिलान किया गया।
यह माना जा रहा था कि यह बाबा ही सुभाषचंद्र बोस थे, मगर बाद में शिमला की इस लैब ने रिपोर्ट दी कि ये हैंडराइटिंग आपस में मेल नहीं खाती हैं। इसी रिपोर्ट के बाद मुखर्जी कमीशन ने माना है कि ये गुमनाम बाबा सुभाषचंद्र बोस नहीं थे।
‘नेताजी डिस्अपीयरेंस केस’ की जांच कर रहे मुखर्जी कमीशन ने इस मामले की फोरेंसिक जांच शिमला स्थित फोरेंसिक प्रयोगशाला जीईक्यूडी को दी। वर्तमान में यह लैब सीएफएल चंडीगढ़ के तहत आती है।
लिखाई से सामने आया सच
लैब के सूत्रों ने बताया कि प्रयोगशाला में नेताजी और गुमनामी बाबा की हैंड राइटिंग्स को मिलाने पर पाया गया कि दोनों की लिखाई सरसरी तौर पर देखने में मेल खाती लगती हैं, मगर दोनों के लिखने के स्ट्रेस, वर्ल्ड स्ट्रक्चर और कई अन्य तकनीकी भिन्नताएं थीं।
इस जांच के बाद जीईक्यूडी ने रिपोर्ट दी कि दोनों ही हैंडराइटिंग्स एक आदमी की नहीं थी। इसके बाद यह जांच दोबारा कोलकाता स्थित फोरेंसिक प्रयोगशाला में भी करवाई गई और वहां भी यही रिपोर्ट मिली। इस जांच के लिए डायरियां और पत्र कोलकाता स्थित सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय से जुटाए गए। नेताजी के तीन पत्र आज भी शिमला की इस प्रयोगशाला में सुरक्षित हैं।
कौन थे गुमनामी बाबा?
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के प्रत्यक्षदर्शियों ने जांच में बताया कि गुमनामी बाबा की शक्ल सुभाषचंद्र बोस से मिलती थी। ये साधु के रूप में नेपाल के रास्ते उत्तर प्रदेश में प्रविष्ट हुए। ये 1983 में रामभवन फैजाबाद में रहने लगे। उन्होंने 16 सितंबर 1985 को फैजाबाद में अंतिम सांस ली। इनका अंतिम संस्कार 18 दिसंबर 1985 को फैजाबाद में हुआ।
स्टेट फोरेंसिक लैब, जुन्गा के निदेशक अरुण शर्मा का कहना है कि जीईक्यूडी प्रयोगशाला शिमला में नेताजी सुभाषचंद्र बोस और गुमनामी बाबा की हैंडराइटिंग्स की जांच की गई थी। हालांकि, यह प्रयोगशाला केंद्र सरकार के अधीन आती है।