अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला: शिमला में विद्वान और छात्र मिलकर सीखेंगे ब्राह्मी लिपि की वर्णमाला
प्रदेश में ब्राह्मी लिपि पर आयोजित की जा रही पहली अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला है, जिसमें देश-विदेश के विभिन्न 23 विश्वविद्यालय और प्रदेश के 27 महाविद्यालय के प्रतिभागी भाग ऑनलाइन और ऑफलाइन मोड से हिस्सा ले रहे हैं।
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राज्य संग्रहालय शिमला और राजकीय महाविद्यालय धामी सोलह मील के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार से संग्रहालय में ब्राह्मी लिपि पर अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला शुरू हुई। इसका शुभारंभ प्रख्यात इतिहासकार और पुरातत्वविद प्रो. ओसी हांडा ने किया। यह प्रदेश में ब्राह्मी लिपि पर आयोजित की जा रही पहली अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला है, जिसमें देश-विदेश के विभिन्न 23 विश्वविद्यालय और प्रदेश के 27 महाविद्यालय के प्रतिभागी भाग ऑनलाइन और ऑफलाइन मोड से हिस्सा ले रहे है। इनमें करीब 80 ऑफलाइन और 60 ऑनलाइन मोड से भाग ले रहे हैं। इनमें नामी विश्वविद्यालयों के इतिहास शिक्षक और पुरातत्वविद भी शामिल हैं। कार्यशाला में इतिहास और भारतीय लिपियों पर शोध करने वाले विद्वान और छात्र ब्राह्मी लिपि की वर्णमाला और अक्षरों को सीखेंगे। ब्राह्मी लिपि पर अंकित प्राचीन भारतीय इतिहास के अभिलेख को पढ़ने का प्रयास करेंगे। राजकीय महाविद्यालय धामी के प्राचार्य डॉ. जनेश कपूर और हिमाचल राज्य संग्रहालय के संग्रहाध्यक्ष डॉ. हरी चौहान ने मुख्यातिथि और पहले दिन के मुख्य वक्ता हैदराबाद विवि के प्रो. सुचंद्रा घोष, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक टीएस रविशंकर का स्वागत किया।
अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला को लेकर प्रतिभागियों में उत्साह देखने को मिला। मुख्य वक्ताओं में प्रो. सुचंद्रा घोष ने ब्राह्मी लिपि के मिले अभिलेखों के बारे में विस्तार से जानकारी दी और बताया कि मौर्य और गुप्त वंश के अभिलेख दक्षिण भारत और उत्तरी भारत में मिले हैं। उन्होंने दक्षिण एशिया में ब्राह्मी लिपि के मिले अभिलेखों और प्रचार प्रसार को लेकर किए गए कार्य के बारे में विस्तार से जानकारी दी। दूसरे वक्ता प्रो.टीएस रवि शंकर ने ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति और विकास और इतिहास के अध्ययन में इसके महत्व पर विस्तार से बात रखी। उन्होंने प्रतिभागियों को ब्राह्मी लिपि के अक्षर और वर्णमाला के बारे में बताया। कार्यशाला आयोजन समिति के सचिव डा. किशोरी लाल चंदेल ने बताया कि पहले दिन प्रतिभागी छात्रों और शोधार्थियों को वर्णमाल के बारे में बताया गया। उन्होंने कहा कि वर्णमाला और अक्षर ज्ञान से इतिहासकार और इतिहास के छात्र और शोधार्थी इस लिपि में मिले अभिलेखों को पढ़ कर इतिहास के कई रहस्यों के बारे में ज्ञान अर्जित कर सकेंगे। यही इस कार्यशाला के आयोजन का उद्देश्य है।