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कुल्लू दशहरा: आज भी है नियमों का बंधन; न टनल के भीतर और न फ्लाईओवर के नीचे से गुजरते हैं देवी-देवता

Wed, 21 Oct 2026 05:45 AM IST
Krishan Singh राकेश कुमार, कुल्लू।
राकेश कुमार, कुल्लू। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 21 Oct 2026 05:45 AM IST
सार

देवी-देवता न तो टनल से गुजरते हैं और न ही फ्लाईओवर के नीचे से आवाजाही करते हैं। इसे कुल्लवी भाषा में लंघा कहते हैं। मान्यता है कि देवी-देवताओं का स्थान भगवान के दर्जे का है। 

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International Kullu Dussehra: From the threshold to the water's edge, the devta have their own Lakshman Rekha
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा(फाइल)। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

आधुनिक दाैर में टनल और फ्लाईओवर से होकर भले ही इंसान का सफर आसान हो गया हो, लेकिन कुल्लू के देवी-देवताओं की राह आज भी परंपराओं से तय होती है। देवी-देवता न तो टनल से गुजरते हैं और न ही फ्लाईओवर के नीचे से आवाजाही करते हैं। इसे कुल्लवी भाषा में लंघा कहते हैं। मान्यता है कि देवी-देवताओं का स्थान भगवान के दर्जे का है। सर्वोपरि स्थान होने के कारण ही देवी-देवता लंघा से नहीं गुजरते हैं। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में भाग लेने के लिए कुछ देवी-देवता करीब 150 से 200 किलोमीटर दूरी से आते हैं। इस दौरान यात्रा पैदल ही रहती है। दशहरा उत्सव में विशेष महत्व रखने वाले बिजली महादेव मंदिर कमेटी के कोषाध्यक्ष फतेह सिंह राणा कहते हैं कि देवता लंघा पार नहीं करते हैं। घर की दहलीज तो दूर, घर की छत से टपकने वाले पानी की धार तक को पार नहीं करते। देव परंपराओं में इस मर्यादा का आज भी पूरी श्रद्धा से पालन किया जाता है।

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सैंज घाटी के देव लक्ष्मी नारायण को ब्रह्मा, विष्णु, महेश का अवतार माना जाता है। देवता के कारदार जगरन्नाथ कहते हैं कि देव लक्ष्मी नारायण मंगलवार शाम को अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के लिए ढालपुर पहुंच गए हैं। इस दौरान करीब 300 देवलू भी साथ गए हैं। जितने भी देवलू साथ गए हैं, वे सभी लंका दहन के बाद ही घर लौटेंगे। बीच में कोई घर नहीं आ सकता है। सात दिन तक अब भूमि में ही आसन लगेगा। पूजा-अर्चना के साथ देवता दर्शन के लिए उपलब्ध रहेंगे।

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छत्र को स्पर्श नहीं कर सकते
देवताओं के छत्र को स्पर्श करने की किसी को अनुमति नहीं होती है। यहां तक कि कारकून भी इसे नहीं छू सकते। जगरन्नाथ कहते हैं कि इसे सिर्फ निर्धारित आदमी ही छू सकता है। विशेषकर इसकी अनुमति पुजारी को ही रहती है।

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