फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   interesting facts regarding former cm Virbhadra singh life and political career, he never contested elections from his native land

विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनना चाहते थे वीरभद्र, इंदिरा के कहने पर राजनीति में आए, जन्मभूमि से कभी नहीं लड़ा चुनाव

Thu, 08 Jul 2021 06:20 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
अमर उजाला नेटवर्क, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Thu, 08 Jul 2021 06:20 PM IST
सार

वीरभद्र सिंह कहते थे कि उनका सपना था कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में प्रोफेसर बनें, लेकिन कांग्रेस की वरिष्ठ नेता रहीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर वह राजनीति में आए। 

विज्ञापन
interesting facts regarding former cm Virbhadra singh life and political career, he never contested elections from his native land
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ वीरभद्र सिंह। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश के छह बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह अगर राजनीति में नहीं आते तो दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर होते। प्रदेश में हुई कई जनसभाओं में लोगों से मन की बात में वीरभद्र सिंह यह खुलासा कर चुके हैं। वीरभद्र सिंह कहते थे कि उनका सपना था कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में प्रोफेसर बनें, लेकिन कांग्रेस की वरिष्ठ नेता रहीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर वह राजनीति में आए। 

विज्ञापन


हिमाचल प्रदेश से लेकर देश की राजनीति में अपना सिक्का जमाने वाले वीरभद्र सिंह ने कभी अपनी जन्मभूमि रामपुर से आरक्षण व्यवस्था के चलते विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। इस क्षेत्र में उनका प्रभाव इतना था कि उन्होंने जिस भी प्रत्याशी को आशीर्वाद दिया, वह भारी मतों से जीता। हालांकि, वह प्रदेश के अकेले ऐसे नेता थे, जिन्होंने अपनी जन्मभूमि से बाहर निकलकर बिना हार-जीत की चिंता किए अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी ताल ठोकी। 
विज्ञापन


केंद्र की सियासत से जब उन्होंने हिमाचल की सियासी जमीन पर पैर रखा तो उन्हीं ठाकुर रामलाल की जुब्बल कोटखाई सीट से चुनाव लड़ा, जिन्हें हटाकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था। 1985 में भी वह इसी सीट से चुनाव लड़े और जीते। हालांकि, इसके बाद 1990 में ठाकुर रामलाल प्रदेश की सियासत में वापस लौट आए और जुब्बल कोटखाई से ही चुनावी ताल ठोक दी।
विज्ञापन
विज्ञापन


रामलाल का गढ़ होने के बावजूद वीरभद्र सिंह ने हार-जीत के डर के बिना फिर इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ा और हार गए। हालांकि, इसी दौरान वह रामपुर से लगी दूसरी क्षेत्र रोहडू से चुनाव लड़े और रिकॉर्ड 26 हजार से ज्यादा मतों से जीते। रोहड़ू सीट से वह चार बार और विधायक बने। जब यह सीट आरक्षित हो गई तो 2012 में शिमला ग्रामीण विधानसभा सीट से विधायक बने। यह भी एक गैर परंपरागत सीट थी, जहां से वह पहली बार मैदान में उतरे थे।

नया क्षेत्र होने के बावजूद लोगों में वीरभद्र के प्रति इतना प्रेम रहा कि 2017 में जब उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह ने इस सीट पर अपनी सियासी पारी की शुरुआत की तो कथित भाजपा लहर के बावजूद लोगों ने उन्हें भारी मतों से जिता दिया। इसी दौरान वह खुद सोलन जिले के अर्की विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। भाजपा ने 2017 के चुनावों के दौरान उनको इस सीट पर हराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया।


उनका चुनावी प्रबंधन कहें या फिर सियासी कद, उस सीट से पहली बार चुनाव लड़ने के बावजूद वीरभद्र नामांकन के अलावा सिर्फ एक बार लोगों से मिलने गए, लेकिन लोगों ने उन्हें पांच हजार से ज्यादा मतों से जिता दिया। इस चुनावी जीत के बाद उनका कद इतना बढ़ गया कि उनके लिए यहां तक कहा जाने लगा कि वीरभद्र वाकई हिमाचल के राजा है और वह जिस सीट से भी चाहें लड़कर जीत सकते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed