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मंत्रियों ने 3 साल में पेट्रोल पर खर्चा इतना पैसा, जानकर चौंकेगे

Tue, 10 May 2016 10:20 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला Updated Tue, 10 May 2016 10:20 AM IST
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HP vidhansabha members paid more than one crore on petrol.
मंत्रियों ने तीन साल के कार्यकाल के दौरान गाड़ियों में पेट्रोल भरवाने के नाम पर सवा करोड़ रुपये फूंक दिए।

हिमाचल प्रदेश विधानसभा सदस्यों के वेतन में जहां भारी बढ़ोतरी हुई है, वहीं मंत्रियों ने तीन साल के कार्यकाल के दौरान गाड़ियों में पेट्रोल भरवाने के नाम पर सवा करोड़ रुपये फूंक दिए। गाड़ी की मरम्मत के नाम पर अलग से भारी खर्च किया गया है।

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सोमवार को आरटीआई कार्यकर्ता एवं बालीचौकी क्षेत्र के खलवाहण वार्ड से जिला परिषद सदस्य संत राम ने सूचना को मीडिया से साझा किया। संत राम ने बताया कि उन्हें प्रदेश सचिवालय से सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में बताया गया है कि आबकारी एवं कराधान मंत्री प्रकाश चौधरी ने करीब साढ़े बीस लाख रुपये का ईंधन इस्तेमाल किया है।
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उद्योग मंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने पौने 19 लाख का ईंधन गाड़ी में डलवाया है। ऊर्जा मंत्री सुजान सिंह पठानिया ने 18 लाख, शहरी विकास मंत्री सुधीर शर्मा ने 16 लाख, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री धनी राम शांडिल्य ने 13 लाख, स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ने 12 लाख, पंचायती राज मंत्री अनिल शर्मा ने 11 लाख, परिवहन मंत्री जीएस बाली ने दो साल में 10 लाख और सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य मंत्री विद्या स्टोक्स ने 7 लाख रुपये का ईंधन इस्तेमाल किया है।

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सीएम की दो गाड़ियों में भरा इतना सारा तेल

HP vidhansabha members paid more than one crore on petrol.
मुख्यमंत्री के दो वाहनों में तीन साल में करीब 14 लाख रुपये का ईंधन भरवाया गया है। - फोटो : फाइल फोटो

संत राम ने बताया कि मुख्यमंत्री के दो वाहनों में तीन साल में करीब 14 लाख रुपये का ईंधन भरवाया गया है। गाड़ियों की मरम्मत पर मुख्यमंत्री ने सात लाख रुपये खर्च किए जबकि बाली ने दो साल में एक वाहन की मरम्मत पर करीब साढ़े चार लाख रुपये खर्च किए हैं। सुजान सिंह पठानिया ने अपने वाहन की मरम्मत पर चार लाख से ज्यादा खर्च किए है।

संत राम ने बताया कि प्रदेश सरकार को उधार का ब्याज चुकाने व कर्मचारियों का वेतन अदा करने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है। प्रदेश आर्थिक संकट से गुजर रहा है। लेकिन मंत्री वाहनों पर ही करोड़ों रुपये खर्च कर दे रहे हैं जबकि पंचायती राज प्रतिनिधियों को मजदूरों के न्यूनतम वेतन से भी कम मानदेय दिया जा रहा है।

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