सरकार के इस फैसले पर बढ़ा विवाद, पुलिस ऑफिसर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने जताई आपत्ति
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प्रदेश में आने वाले प्रशिक्षु आईपीएस अधिकारियों की ट्रेनिंग को लेकर विवाद तूल पकड़ने लगा है। सरकार की ओर से प्रमोटी अफसरों के जिले में एसपी लगने के बाद प्रशिक्षु आईपीएस का तबादला करने पर स्टेट पुलिस ऑफिसर्स एसोसिएशन ने आपत्ति जताई है।
एसोसिएशन का कहना है कि सरकार और पुलिस मुख्यालय ने ऐसा कर न सिर्फ हिमाचल पुलिस के अधिकारियों का अपमान किया है, बल्कि आईपीएस और पुलिस के अफसरों के बीच खाई पैदा कर दी है।
सरकार के इस कदम पर एसोसिएशन का कहना है कि 15 हजार से ज्यादा पुलिस कर्मियों वाली हिमाचल पुलिस में करीब बीस डायरेक्ट आईपीएस हैं, जबकि स्टेट पुलिस के पौने दो सौ से ज्यादा अफसर हैं।
इसके अलावा करीब पंद्रह हजार अन्य रैंक के कर्मचारी हैं। प्रदेश पुलिस से आईपीएस बनने वाले अधिकारी बीस से 25 साल की सर्विस कर पुलिस की हर बारीकी सीखते हुए उस पद पर पहुंचता है, जबकि डायरेक्ट आईपीएस को पांच से सात साल की नौकरी में ही एसपी बन जाते हैं।
इसलिए उठा विवाद
ऐसे में डायरेक्ट आईपीएस से कहीं ज्यादा काबिलियत प्रमोटी अफसर में होती है। एसोसिएशन ने इसका उदाहरण देते हुए कहा कि प्रदेश के दो चर्चित मामलों गुड़िया व होशियार सिंह कांड की जांच की जिम्मेदारी आईजी रैंक के डायरेक्ट आईपीएस अधिकारियों के जिम्मे था।
दोनों ही मामलों में सिर्फ पुलिस की छवि खराब हुई है। हाल में बद्दी में डायरेक्ट आईपीएस के एसपी होने के बावजूद न सिर्फ अव्यवस्था हुई, बल्कि सीएम को एसपी का तबादला तक करना पड़ गया।
प्रदेश कैडर मिलने के बाद 2016 बैच के तीन प्रशिक्षु आईपीएस अफसर आकृति शर्मा, वत्सला और अभिषेक यादव जिला प्रैक्टीकल प्रशिक्षण द्वितीय चरण के लिए हिमाचल पहुंचे।
करीब साल भर एसपी ऑफिस से लेकर पुलिस थाने तक तैनात रहकर पुलिसिंग सीखने के लिए सरकार ने आकृति शर्मा को जनवरी में शिमला, वत्सला गुप्ता को मंडी और अभिषेक यादव को कुल्लू में तैनाती दी। इसी बीच शिमला और मंडी एसपी का तबादला हो गया।
वहां प्रदेश पुलिस सेवा से पदोन्नत होकर आईपीएस बने अफसर तैनात हो गए। दोनों की तैनाती के कुछ दिन बाद ही सरकार ने आकृति और वत्सला का तबादला शिमला से हमीरपुर और मंडी से बिलासपुर कर दिया। कुल्लू में अभी भी डायरेक्ट आईपीएस एसपी हैं, इसलिए वहां तैनात अभिषेक का तबादला नहीं किया गया।