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HP High Court: दूसरे राज्य के लिए प्रवास पर आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता

Sat, 12 Nov 2022 08:38 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
अमर उजाला नेटवर्क, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Sat, 12 Nov 2022 08:38 PM IST
सार

 अदालत ने स्पष्ट किया कि एक राज्य से दूसरे राज्य के लिए किसी भी कारण से प्रवासन करना प्रवासी राज्य में एससी, एसटी और ओबीसी के लाभ का दावा करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता है। किसी विशेष जाति या जनजाति की घोषणा के लिए प्रवासी राज्य में विभिन्न मानदंड हो सकता है।

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HP High Court:Cannot get benefit of reservation on migration to other state
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आरक्षण के मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा है कि हिमाचल में रह रहे प्रवासियों को यहां आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता, भले ही विवाह को आधार बनाया गया हो या फिर उसे अपने राज्य में कोई आरक्षण मिला हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक राज्य से दूसरे राज्य के लिए किसी भी कारण से प्रवास अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लाभ का दावा करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता है। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने प्रवासी प्रियंका की याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया है।  

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याचिकाकर्ता मूल रूप से हरियाणा के गुज्जर समुदाय से हैं। गुज्जरों को हरियाणा में अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा प्राप्त है। याचिकाकर्ता ने हिमाचल के गुज्जर समुदाय में शादी की। हिमाचल में गुज्जर समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला है। याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित भाषा अध्यापक के पद के लिए आवेदन किया। 10 मार्च 2017 को शिक्षा विभाग ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि याचिकाकर्ता अनुसूचित जनजाति से संबंध नहीं रखती। खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का दर्जा एक राज्य की सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है। आरक्षण देने का मुख्य मकसद यह है कि वे समान शर्तों पर विकसित वर्ग समुदाय से प्रतिस्पर्धा कर सकें। सामाजिक स्थिति अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकती है। किसी जाति या किसी जनजाति को पूरे देश के लिए अनुसूचित जाति के रूप में सामान्यीकृत करना उचित नहीं है।
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एचआरटीसी को 40.35 लाख रुपये मुआवजा देने के आदेश
शिमला। हिमाचल पथ परिवहन निगम को जिला अदालत ने 40.35 लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश दिए हैं। वाहन दुर्घटना में मृतक के आश्रितों को अदालत ने मुआवजे का हकदार ठहराया है। बहादुर सिंह वाहन दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण शिमला ने मुआवजे की राशि पर 7.5 फीसदी ब्याज भी अदा करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे की राशि दो महीनों के भीतर बस ड्राइवर और निगम दोनों को देनी होगी।  आश्रितों में मृतक की पत्नी और दो बच्चे शामिल हैं। 10 जून 2019 को बहादुर सिंह शोघी से शिमला की तरफ अपनी कार से सफर कर रहा था। इस दौरान शिमला की ओर से आ रही निगम की बस ने मृतक की गाड़ी को टक्कर मार दी। इस दुर्घटना में चालक की मौत हो गई थी। मृतक के आश्रितों ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण शिमला के समक्ष मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी। दलील दी गई कि इस दुर्घटना का मुख्य कारण चालक की लापरवाही थी। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद आश्रितों की ओर से मुआवजे के लिए दायर की गई याचिका को स्वीकार किया।

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अधीनस्थ अदालतों के प्रशासनिक कार्य भी देखेंगे हाईकोर्ट के न्यायाधीश

 हिमाचल प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश एए सैयद ने हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के बीच राज्य के सिविल और सत्र प्रभागों के प्रशासनिक कार्य को बांट दिया है। इस संबंध में जारी अधिसूचना के अनुसार न्यायाधीश सबीना को सिविल और सत्र प्रभाग शिमला के प्रशासनिक कार्य का जिम्मा सौंपा गया है।

न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान को कांगड़ा, न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर को मंडी, न्यायाधीश अजय मोहन गोयल को ऊना और हमीरपुर, न्यायाधीश संदीप शर्मा को सोलन और बिलासपुर, न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ को कुल्लू, न्यायाधीश सत्येन वैद्य को चंबा, न्यायाधीश सुशील कुकरेजा को सिरमौर और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह को किन्नौर सिविल और सत्र प्रभाग का प्रशासनिक कार्य सौंपा गया है। इस अधिसूचना की प्रतिलिपि को प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीश को भेज दिया गया है। 

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