बागवानी: हिमाचल में 10 दिन पहले शुरू हुआ चेरी का सीजन, दोगुने मिल रहे दाम
प्रदेश में चेरी की सबसे अधिक पैदावार शिमला जिले के ननखड़ी, कोटगढ़ और नारकंडा क्षेत्रों में होती है। सीजन की शुरुआत में चेरी लोकल मार्केट में ही खप रही है। आने वाले दिनों में शिमला से चेरी बंगलूरू, महाराष्ट्र और गुजरात तक भेजी जाएगी।
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हिमाचल की रसीली चेरी ने बाजार में दस्तक दे दी है। इस साल चेरी का सीजन करीब 10 दिन पहले शुरू हो गया है। समय से पहले तापमान बढ़ना इसका कारण बताया जा रहा है। सीजन की शुरूआत में ही बागवानों को 300 रुपये प्रति किलो तक रेट मिल रहे हैं, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुने हैं। मंगलवार को शिमला की ढली मंडी में चेरी 200 से 300 रुपये प्रतिकिलो के रेट पर बिकी। पिछले साल एक मई को चेरी बाजार में पहुंची थी और कीमत अधिकतम 150 रुपये थी।
प्रदेश में चेरी की सबसे अधिक पैदावार शिमला जिले के ननखड़ी, कोटगढ़ और नारकंडा क्षेत्रों में होती है। सीजन की शुरुआत में चेरी लोकल मार्केट में ही खप रही है। आने वाले दिनों में शिमला से चेरी बंगलूरू, महाराष्ट्र और गुजरात तक भेजी जाएगी। मंगलवार को चेरी बेचने ढली मंडी पहुंचे ननखड़ी खड़ाहन के बागवान कमल राणा ने बताया कि उनके 150 बक्से 250 से 300 रुपये प्रति बॉक्स के रेट पर बिके। बीते साल शुरूआत में 140 से 160 रुपये रेट थे।
ननखड़ी के गाहण निवासी रमेश मेहता ने बताया कि उनके 350 बाक्स 230 से 300 रुपये के बीच बिके। मझारठी के राम सिंह ने बताया कि सूखे के कारण चेरी का आकार नहीं बढ़ रहा। बारिश हो तो आकार बढ़ेगा और रंगत भी सुधरेगी। आढ़ती एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनूप चौहान ने बताया कि इस साल प्रदेश में चेरी सीजन 10 दिन पहले शुरू हो गया है। सूखे के कारण चेरी का साइज कम है। मार्केट में चेरी की अच्छी डिमांड है। ढली मंडी के करोल ब्रदर्स के संचालक अक्षय करोल ने बताया कि चेरी को रिकॉर्ड रेट मिल रहे हैं।
ढली मंडी में 55 रुपये किलो पहुंचे मटर के दाम
ढली मंडी में मटर के दामों में तेजी आई है। 30 से 35 रुपये किलो से शुरू हुए मटर के दाम 55 रुपये तक पहुंच गए हैं। करसोग, ठियोग और कोटखाई सहित अन्य इलाकों से मटर शिमला पहुंच रहा है। ढली मंडी आढ़ती एसोसियेशन के उपाध्यक्ष अमन सूद ने बताया कि सूखे की मार से मटर की क्वालिटी अच्छी नहीं आ रही। फसल भी कम है जिसके कारण दाम बढ़े हैं। मंडी में रोजाना 1600 से 2000 बोरी मटर पहुंच रहा है।
फूल का सीजन शुरू, परवाणू मंडी नहीं पहुंचे अभी आढ़ती
कोविड के दौरान दो वर्ष कोविड के बीच फूल उत्पादकों को करोड़ों रुपये का नुकसान झेलना पड़ा है। इस वर्ष उत्पादकों को घाटे से उभरने की उम्मीद मिली है। सोलन के डांगरी, घट्टी और चायल क्षेत्र में फूल की पैदावार तैयार है, लेकिन प्रदेश की एकमात्र परवाणू फूल मंडी में अभी तक आढ़ती ही नहीं पहुंचे हैं।
इस कारण उत्पादकों को चंडीगढ़ और दिल्ली फूल भेजने को मजबूर होना पड़ रहा है। दिल्ली में जिले का कारनेशन फूल 200 से 250 रुपये प्रति बंच बिक रहा है। एक बंच में 20 फूल होते है। दामों को लेकर उत्पादक खुश हैं, लेकिन चंडीगढ़ और दिल्ली फूल पहुंचने में अधिक खर्चा हो रहा है। परवाणू मंडी शुरू होने से खर्चा भी कम होगा।
कोविड के बीच लॉकडाउन के कारण करोड़ों रुपये के फूल पशुओं का चारा बन गए थे। सोलन का फूल चंडीगढ़, दिल्ली की मंडी तक पहुंचाया जा रहा है। सोलन का चायल क्षेत्र फूलों की खेती के लिए काफी मशहूर है। यहां लोग बड़ी संख्या में गुलाब, कारनेशन, गेंदा, बेला जैसे फूलों की खेती करते हैं।
इस बार अप्रैल माह में शादी के सीजन से फूल उत्पादकों को अच्छे कारोबार की उम्मीद है। चायल के फूल उत्पादक दिनेश कुमार, अशोक वर्मा, गगनदीप, सुशील वर्मा, विकुल वर्मा संजीव कुमार सुनील ने कहा कि फूल तैयार है, जिसे दिल्ली भेजा रहा है। परवाणू मंडी अभी तक शुरू नहीं हुई है।
उधर, मंडी समिति सोलन के सचिव डॉ. रविंद्र शर्मा ने बताया कि मई माह से परवाणू मंडी में फूलों का कारोबार शुरू किया जाएगा। इसके लिए दस दुकानों का आवंटन किया गया है। जिससे प्रदेश के फूल उत्पादकों को बेहतरीन सुविधा मिलेगी। मई माह से फूल भी रश पर चलना शुरू हो जाएगा।