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आम और खास में फर्क नहीं करता ऐतिहासिक मिंजर मेला, यहां जानिए पूरा मामला

Fri, 03 Aug 2018 11:28 AM IST
सुभाष कुमार अग्निहोत्री, अमर उजाला, चंबा
सुभाष कुमार अग्निहोत्री, अमर उजाला, चंबा Updated Fri, 03 Aug 2018 11:28 AM IST
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Historical Minor Mela does not distinguish between common and special

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कहे जाने वाले चंबा के ऐतिहासिक मिंजर मेले में आम और खास में फर्क नहीं होता। रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम की सात संध्याआें के लिए पंडाल में बैठने के इंतजाम सभी के लिए एक जैसे होते हैं।

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मुख्य अतिथि के तौर पर भले ही मुख्यमंत्री क्यों न पधारे हों, पंडाल में दर्शक दीर्घा में उन्हें भी जमीन पर बैठना पड़ता है। मुख्य और विशिष्ट अतिथियों के लिए खास इंतजाम सिर्फ इतना ही होता है कि उन्हें पहली कतार में बैठाया जाता है।

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मिंजर मेला आपसी मेलजोल का मेला

Historical Minor Mela does not distinguish between common and special

देवभूमि हिमाचल में कई ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान होते हैं, लेकिन ऐसी व्यवस्था कहीं और देखने को नहीं मिलती। पंडाल में दर्शक दीर्घा की इस समानता को आयोजन का महत्वपूर्ण पहलू भी माना जाता है। 

वरिष्ठ नागरिक पीसी ओबराय ने बताया कि मिंजर मेला आपसी मेलजोल का मेला है। इसी मेलजोल का प्रमाण है कि सांस्कृतिक संध्याओं में आज दर्शक और मुख्यातिथि जमीन पर बैठ कर सांस्कृतिक कार्यक्रम का लुत्फ उठाते हैं। 

दसवीं शताब्दी में शुरू हुआ मिंजर मेला

Historical Minor Mela does not distinguish between common and special

वरिष्ठ नागरिक यादवेंद्र चौणा कहते हैं कि मिंजर मेले के आयोजन का जिम्मा नप प्रशासन और जिला प्रशासन के पास आया, तभी से ही सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। मेले की यह खासियत इसे और भी अनोखा बनाती है।

वरिष्ठ नागरिक रविंद्र सिंह किश्तवाड़िया मिंजर मेले को आपसी भाईचारे का प्रतीक बताते हैं। पद्मश्री विजय शर्मा का कहना है कि मिंजर मेले की खास रिवायत मेले के आरंभ से ही चली आ रही है।

दसवीं शताब्दी में राजा साहिल वर्मन के समय में मिंजर मेला आरंभ हुआ था। यह मेला लक्ष्मीनारायण मंदिर में मिर्जा परिवार द्वारा तैयार की जाने वाली मिंजर को अर्पित करने से आरंभ होता है। लोग नरसिंह मंदिर में मेला मनाते थे।

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वर्ष 1962 में मिंजर का झंडा बनाया गया

Historical Minor Mela does not distinguish between common and special

तीन दिनों में  दो दिन भोजड़ी होती थी। इस दौरान लोग अपने घरों से विभिन्न पकवान बनाकर ले जाते थे और टाले पर एकत्रित होकर खाते थे। मिंजर विसर्जन के समय राज परिवार की महिलाएं ऐतिहासिक चामुंडा माता मंदिर से इसका नजारा देखती थीं। वर्ष 1962 में मिंजर का झंडा बनाया गया।  

मिंजर मेले के दौरान आयोजित होने वाली सांस्कृतिक संध्याओं में मुख्यातिथि सहित दर्शक जमीन पर बैठकर ही कार्यक्रमों का लुत्फ उठाते हैं। मिंजर मेले की सांस्कृतिक संध्याओं के दौरान होने  वाली यह रिवायत इसे अन्य मेलों से अलग करती है।- सुदेश राणा, जिला भाषा अधिकारी 

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