हिमाचल में फिर आ गए चुनाव, इस समुदाय को 49 सालों से नहीं मिला हक
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हिमाचल के जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र के हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा देने का मामला फाइलों में ही अटक गया है। सरकारें बदलती गईं। चुनावी मौसम में घोषाणाएं होती रहीं। लेकिन इस पिछड़े क्षेत्र के लोगों को जनजातीय दर्जा नहीं मिल सका। पिछले 49 सालों से इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों ने सिर्फ सियासी रोटियां सेंकने का ही काम किया।
अब विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यह मुद्दा फिर गरमाने लगा है। पांच मई को हरिपुरधार आए केंद्रीय जनजातीय मंत्री जुएल ओरम ने चुनाव आचार संहिता से पहले एसटी दर्जा देने की घोषणा की थी, जो अब तक पूरी नहीं हुई है। उधर, कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बनाकर भाजपा को घेरने की तैयारी कर ली है।
सिरमौर के गिरिपार का हाटी समुदाय जनजातीय दर्जे के लिए करीब 49 साल से संघर्ष कर रहा है। 119 पंचायतों में करीब पौने तीन लाख आबादी हाटी समुदाय की है। हाटी समुदाय की लोक संस्कृति, मेले, त्योहार, धार्मिक मान्यताएं तथा सामाजिक- आर्थिक हालात साथ लगते उत्तराखंड के जोंसारा समुदाय से एकदम मिलते-जुलते हैं।
हाटी और जोंसारा समुदाय के लोग एक ही वंश के हैं। इन दोनों समुदायों में आज भी भाईचारा और दाईचारा है। उत्तराखंड का जोंसार बाबर क्षेत्र 1933 तक सिरमौर रियासत का ही हिस्सा था। 1967 में भारत सरकार ने इसे जनजातीय क्षेत्र घोषित कर दिया। तमाम समानताओं और संघर्ष के बावजूद गिरिपार क्षेत्र के लोगों को जनजातीय दर्जा नहीं मिल पाया है। 1967 से यहां के लोग संघर्ष कर रहे हैं।
ये रही टाइमलाइन
- वर्ष 1979 में ट्राइबल कमीशन के सदस्य टीएस नेगी की कमेटी ने इलाके का दौरा किया। उन्होंने इसकी रिपोर्ट भी सौंपी।
- वर्ष 1995 में मामला लोकसभा में उठाया गया।
- वर्ष 2011 में केंद्र सरकार ने राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी। राज्य सरकार ने प्रदेश विश्वविद्यालय के जनजातीय शोध एवं अध्ययन संस्थान को यह जिम्मा सौंपा।
- वर्ष 2016 में इसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी गई। अब मामले की फाइल रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के पास लंबित है।
क्या कहते हैं लोग
हाटी समिति के महासचिव कुंदन शास्त्री का कहना है कि मामला 49 वर्षों से लंबित है। फाइल अब केंद्र तक पहुंची है। इस मुद्दे पर जल्द फैसला लेकर हाटी को जनजातीय घोषित किया जाना चाहिए।
फिर उठाया है मामला, वक्त लगेगा
शिमला संसदीय क्षेत्र से सांसद वीरेंद्र कश्यप का कहना है मामला आरजीआई तक पहुंचा है। 25 सितंबर को गृह मंत्री, जनजातीय मंत्री और आरजीआई से मुलाकात कर मामला फिर से उठाया गया है। यह मामला जल्दबाजी में हल होने वाला नहीं है। इसमें समय लगेगा ही। कांग्रेस ने वर्षों तक इस मामले को दबाए रखा। रिपोर्ट सौंपने में ही कई वर्ष लगा दिए। जनजातीय मंत्री ने लोकसभा चुनाव को आधार मानते हुए घोषणा की थी, न कि विधानसभा की।
हमने रिपोर्ट भेजी, केंद्र से ढिलाई
सीपीएस एवं विधायक रेणुका विनय कुमार ने कहा कि राज्य सरकार ने पूरी रिपोर्ट केंद्र को भेज दी है। पहले भी भेजी थी। लेकिन मापदंड बदलने के कारण फिर से रिपोर्ट तैयार कर भेजी गई है। केंद्र सरकार ढीली है। केंद्रीय जनजातीय मंत्री आचार संहिता से पहले दर्जा देने की घोषणा तो कर गए, लेकिन अभी तक अमल नहीं हुआ। अब सारा काम केंद्र सरकार को ही करना है।