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HP High Court: लंबे समय तक अभियोग के विचारण न होने पर अभियुक्त जमानत का हकदार
Sun, 21 May 2023 11:26 AM IST
अरविन्द ठाकुर
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Sun, 21 May 2023 11:26 AM IST
सार
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि आरोपी से बरामद की गई मादक पदार्थ की मात्रा वाणिज्यिक नहीं है। मामले पर विचारण करने से पहले ही आरोपी को सजा देना गैर कानूनी है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने विचाराधीन कैदी को जमानत पर रिहा करने के मामले में अहम निर्णय सुनाया है। न्यायाधीश सत्येन वैद्य ने अपने निर्णय में कहा कि लंबे समय तक अभियोग के विचारण न होने पर अभियुक्त जमानत का हक रखता है। मुकदमे का शीघ्र निपटारा किया जाना अभियुक्त का मौलिक अधिकार है। इस अधिकार को कठोर नियम से कमजोर नहीं किया जा सकता है। नशीली दवाइयां रखने के आरोपी को सशर्त जमानत देते हुए अदालत ने यह व्यवस्था दी है।
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अदालत ने हुसैन मोहम्मद को एक लाख रुपये के मुचलके पर रिहा करने के आदेश दिए है। अदालत ने शर्त लगाई है कि याचिकाकर्ता अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों से छेड़छाड़ नहीं करेगा और पुलिस जांच में शामिल होगा। बिना अदालत की अनुमति से वह भारत से बाहर नहीं जाएगा। अदालत ने अपने आदेशों में स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता अदालत की ओर से लगाई गई शर्तों का उल्लंघन करता है तो पुलिस जमानत रद्द करने के लिए आवेदन कर सकती है।
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अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि आरोपी से बरामद की गई मादक पदार्थ की मात्रा वाणिज्यिक नहीं है। मामले पर विचारण करने से पहले ही आरोपी को सजा देना गैर कानूनी है। मामले पर विचारण करने के लिए अदालत को समय लगेगा। उस समय तक आरोपी को जेल में बंद नहीं रख सकते है। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ पुलिस थाना पांवटा साहिब में मादक पदार्थ निरोधक अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है।
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5 नवंबर 2021 को पुलिस ने आरोपी से नशीली दवाइयां पकड़ी थी और उसे गिरफ्तार किया था। आरोपी ने दलील दी कि उसे चरस रखने के मामले में झूठा फंसाया गया है। पुलिस की ओर से दलील दी गई कि मादक पदार्थ निरोधक अधिनियम की धारा 37 के तहत आरोपी जमानत का हक नहीं रखता है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि हिरासत की अवधि के दौरान मुकदमे के लंबित रहने पर धारा 37 के प्रावधानों को समान प्रभावकारिता के रूप में नहीं माना जा सकता।
मादक पदार्थ निरोधक अधिनियम की धारा 37 में प्रावधान है कि किसी अभियुक्त को जमानत तब तक नहीं दी जानी चाहिए जब तक कि अभियुक्त दोहरी शर्तों को पूरा करने में सक्षम न हो। यानी यह विश्वास करने के लिए उचित आधार हो कि अभियुक्त इस तरह के अपराध का दोषी नहीं है। साथ ही अभियुक्त इस तरह का अपराध नहीं करेगा या ऐसा करने की संभावना नहीं है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए अपने निर्णय में कहा कि बिना दोष सिद्धि के आरोपी को कारावास में रखना उचित नहीं है।