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हिमाचल: पीच वैली राजगढ़ में पिछले 25 साल में 85 फीसदी घट गया आडू़ का उत्पादन

Mon, 25 Aug 2025 02:37 PM IST
Krishan Singh वेद प्रकाश ठाकुर, संवाद न्यूज एजेंसी, राजगढ़ (सिरमौर)।
वेद प्रकाश ठाकुर, संवाद न्यूज एजेंसी, राजगढ़ (सिरमौर)। Published by: Krishan Singh Updated Mon, 25 Aug 2025 02:37 PM IST
सार

बढ़ते विपणन खचों की तुलना में दाम न मिलने, ग्लोबल वार्मिंग और फसल में लगने वाले रोग फाइटोप्लाज्मा के चलते बागवान आडू़ की खेती से दूर होते जा रहे हैं। 

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Himachal: Peach production in Peach Valley Rajgarh has decreased by 85 percent in the last 25 years
आडू़ - फोटो : संवाद

विस्तार

पीच वैली ऑफ हिमाचल के नाम से प्रसिद्ध राजगढ़ क्षेत्र में आडू़ उत्पादन लगातार सिमटता जा रहा है। बढ़ते विपणन खचों की तुलना में दाम न मिलने, ग्लोबल वार्मिंग और फसल में लगने वाले रोग फाइटोप्लाज्मा के चलते बागवान आडू़ की खेती से दूर होते जा रहे हैं। पिछले पच्चीस साल में करीब 85 फीसदी उत्पादन कम हो गया है। 70 के दशक में भाणत निवासी स्व. लक्ष्मीचंद वर्मा ने सबसे पहले पौधे लगाए तो लोग उन्हें ताने देते थे कि उनका परिवार तो भूखा मर जाएगा। जब अच्छी आमदनी हुई तो समूचे राजगढ़ क्षेत्र ही नहीं, बल्कि जिला सिरमौर में लोग आइ के बगीचे लगाने लगे। 1972 में शुरू हुई आडू की यह यात्रा 1978 से 2000 तक बुलंदी पर पहुंची।

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जिला सिरमौर में आडू के बगीचों का क्षेत्र करीब पांच हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया था। उत्पादन 7 से 8 हजार मीट्रिक टन तक पहुंच गया। इसको देखते हुए 5 मई 2005 को तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने राजगढ़ क्षेत्र को पीच वैली ऑफ हिमाचल घोषित किया था।  वर्तमान में जिला में आडू का क्षेत्र घटकर मात्र 1250 हेक्टेयर तक सिमट चुका है। उत्पादन भी मात्र 1200 मीट्रिक टन रह गया है। कारण आडू में लगने इसका सबसे बड़ा वाली वायरस जनित बीमारी रही, जिससे लोगों के बगीचे कुछ वर्षों में ही सूख गए। मौसम की बेरुखी व बढ़ते विपणन खर्चों ने भी बागवानों को आडू उत्पादन से विमुख किया। जिले में तीन फूड प्रोसेसिंग यूनिट धौलाकुआं, बागथन व राजगढ़ 70 के दशक में स्थापित कर दिए थे, जो अब बंद पड़े हैं। 

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दाम दोगुना तो खर्च 12 से 15 गुणा बढ़ा
70 के दशक में जहां बागवानों की आडू़ की एक पेटी दिल्ली मंडी में 150-200 450 में बिक पाती है। यानी मात्र दोगुना दाम बढ़े। वहीं, विपणन के खचों में 12-15 गुणा वृद्धि हुई है। उस समय एक पेटी पर मात्र 15-20 रुपये खर्च आता था जो अब बढ़कर 200-250 रुपये हो गया है। इसके चलते आडू़ उत्पादकों ने पंजाब व चंडीगढ़ मंडियों में क्रेट के माध्यम से आडू़ भेजने शुरू किए। वहां भी उन्हें उचित दाम नहीं मिल पाते हैं। क्षेत्र में आडू़ की अगेती फसलें पैरा डीलक्स, रेड हेवम, सन हेवन, शाने पंजाब, जुलाई एलबर्टा व एलबर्टा ज्वाइंट उगाई जाती हैं।

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इतना है आडू़ का उत्पादन
एसएमएस उद्यान विनोद धौल्टा ने बताया कि वर्ष 20-21 में आडू़ 1700 हेक्टेयर में लगा था, जबकि उत्पादन 2083 मीट्रिक टन था। वर्ष 21-22 में 1900 हेक्टेयर में उत्पादन 2820 मीट्रिक टन, वर्ष 22-23 में 1257 हेक्टेयर में उत्पादन सबसे कम 600 मीट्रिक टन रहा। वर्ष 23-24 में आडू का 1282 हेक्टेयर में उत्पादन 1947 मीट्रिक टन और वर्ष 24-25 में 1211 हेक्टेयर में 1210 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ।

क्या कहते हैं बागवान
सेर निवासी प्रगतिशील किसान-बागवान विनोद तोमर, सुरेंद्र तोमर व मनीण निवासी रविदत्त भारद्वाज ने कहा कि आडू़ के उचित दाम न मिलने व बीमारियों के कारण उन्होंने भी सेब, प्लम व कीवी के बगीचे लगा दिए हैं। सेवानिवृत्त उपनिदेशक उद्यान डॉ. एसके कटोच ने बताया कि उनके कार्यकाल में ही राजगढ़ को पीच वैली ऑफ हिमाचल घोषित किया गया था। लोग आडू़ के स्थान पर सेब, प्लम व कीवी उत्पादन पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। उसके लिए भी सरकार को कोल्ड स्टोरेज सुविधा व रेफ्रिजरेटिड वाहन इत्यादि के साथ फूट प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने चाहिए।

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